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मंगलवार, 25 जून 2019

नसीरुद्दीन शाह - एक्टिंग का स्कूल

सौ साल लंबे भारतीय सिनेमा के सफर में जिन कुछ कलाकारों ने अपने अभिनय का लोहा बार-बार मनवाया है, नसीरुद्दीन शाह का नाम उनमें काफी ऊपर है

दुनिया में भारत में सबसे ज्यादा फिल्में बनतीं और देखी भी जाती हैं। यहां साथ कई भाषाओं में न सिर्फ फिल्मों का निर्माण होता है, बल्कि उससे जुड़ी एक अलग कला संस्कृति भी विकसित हुई है। बावजूद इसे विश्व में भारतीय सिनेमा का रचनात्मक हस्तक्षेप बहुत कम है। एक उत्सव प्रधान देश में फिल्में भी आमतौर पर मनोरंजन का साधन हैं। अस्सी के दशक में भारतीय सिनेमा के इस पारंपरिक चरित्र के समानांतर एक नई कोशिश कुछ फिल्मकारों और अभिनेताओं ने मिलकर की। इनमें अभिनेताओं में जो नाम सबसे पहले जेहन में आता है, वह है- नसीरुद्दीन शाह। इस लाजवाब अभिनेता ने कला और व्यावसायिक दोनों ही तरह की फिल्मों में अपनी अभिनय की छाप छोड़ी।    
कुछ कलाकारों में कला पैदायशी होती है। नसीरुद्दीन शाह उनमें से एक हैं। उनका जिक्र होते ही एक ऐसे साधारण लेकिन आकर्षक व्यक्तित्व की छवि सामने आती है, जिसकी अभिनय-प्रतिभा अतुलनीय है, जिसके चेहरे का तेज असाधारण है। उन्हें एक्टिंग का स्कूल कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। 

पहली फिल्म ‘निशांत’
20 जुलाई 1950 को लखनऊ से करीब 40 किमी दूर बाराबंकी शहर के घोसियाना मोहल्ले में सेना के एक अधिकारी इमामुद्दीन शाह के परिवार में नसीर साहब ने जन्म लिया था। अपनी पहली फिल्म ‘निशांत’ में छोटे जमींदार का किरदार हो या फिर ‘पार’ में संघर्षमय मजदूर की भूमिका, ‘जाने भी दो यारो’ का फोटोग्राफर विनोद चोपड़ा या फिर ‘स्पर्श’ में नेत्रहीन बच्चों के स्कूल का प्रधानाचार्य, हर किरदार, हर भूमिका में नसीर साहब ने जान फूंक दी।   

एनएसडी में दाखिला 
नसीरुद्दीन शाह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। अभिनय के इस प्रतिष्ठित संस्थान से अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लेने के बाद वे रंगमंच और हिंदी फिल्मों में सक्रिय हो गए। नसीरुद्दीन शाह ने 18 साल की उम्र में राज कपूर और हेमा मालिनी की फिल्म ‘सपनों के सौदागर’ में काम किया था, लेकिन फिल्म रिलीज होने से पहले उनका सीन एडिट कर दिया गया था। 

ड्रग्स की लत थी 
अपनी आत्मकथा में ही नसीरुद्दीन ने अपनी नशे की लत का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि जीवन के एक कठिन मोड़ पर उन्हें चरस-गांजे की लत लग गई थी। शाह ने लिखा है कि वह कभी दूसरों को ड्रग्स का सेवन करने की सलाह नहीं देंगे। इसे वे कलाकार के नौतिक संतुलन के खिलाफ मानते हैं। 
नसीरुद्दीन के भतीजे मोहम्मद अली शाह बॉलीवुड में फिल्म ‘यारा’ के साथ अपनी पारी खेलने उतरे हैं। वे बताते हैं, ‘नसीर साहब मेरी प्रेरणा हैं उनसे मैंने एक्टिंग के अलावा अपनी कला के प्रति ईमानदारी और अनुशासन भी सीखा है। वे हमेशा कहते हैं कि एक अच्छा कलाकार बनने से पहले एक अच्छा इंसान होना बहुत जरूरी है।’

पिता की नाराजगी
एक इंटरव्यू में नसीर ने बताया है, ‘मैं पढ़ाई में बड़ा कमजोर था। बात-बात पर शिक्षकों से थप्पड़ खाता था। तो मैंने सोचा अभिनय के क्षेत्र में चला जाऊं। पढ़ाई से बचने का यही एकमात्र रास्ता है।’ नसीर कहते हैं कि जब उन्होंने यह फैसला किया तो उस वक्त उनकी उमर कोई 11-12 साल की रही होगी। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता को उनके इस इरादे के बारे में बिल्कुल नहीं मालूम था।
नसीर कहते हैं, ‘जब मैंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर ली तो मेरे पिता ने कहा कि अब आगे क्या करना है, तो मैंने कहा कि मैं तो एक्टिंग ही करूंगा।’ नसीरुद्दीन शाह के पिता ने पहले तो उनके इस फैसले का विरोध किया, पर बाद में उन्हें इजाजत दे दी। इसके बाद नसीर ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लिया।

जानलेवा हमला 
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया में नसीरुद्दीन की दोस्ती राजेंद्र जसपाल से काफी खास थी। हालांकि दोनों की दोस्ती घृणा में बदल गई थी जब राजेंद्र को नसीर की तरक्की से असहजता होने लगी। नसीरुद्दीन ने अपनी आत्मकथा ‘एंड देन वन डे’ में लिखा है कि फिल्म भूमिका की शूटिंग के दौरान एक ढाबे पर उन पर जानलेवा हमला हुआ था। वह यह देखकर दंग रह गए थे कि यह उनको मारने की कोशिश करने वाला उनका अपना दोस्त राजेंद्र जसपाल था। राजेंद्र को लगता था कि जो फिल्में नसीर कर रहे हैं, वो उन्हें मिलनी चाहिए थी।

‘मिर्जा गालिब’
गुलजार ने ‘मिर्जा गालिब’ पर एक पॉपुलर टीवी सीरीज बनाई थी। उन्होंने गालिब की भूमिका के लिए नसीर साहब को ही चुना। आज भी यू ट्यूब पर लाखों लोग रोज इसे देखते हैं। यकीनन आज की पीढ़ी ने गालिब को नसीरुद्दीन शाह के जरिए ही जाना है। नसीर साहब ने खुद भी माना है कि गालिब का किरदार निभाना उनके लिए काफी चुनौती भरा रहा। अपने इस अभिनय तजुर्बे को वे अपनी जिंदगी के बेहतरीन अभिनय तजुर्बे में एक मानते हैं।     
        
‘इंटीरियर कैफे नाइट’
यदि फिल्मों को क्रिकेट माना जाए तो ‘इंटीरियर कैफे नाइट’ को नसीरुद्दीन शाह के लिए टी-20 मैच कहा जा सकता है और यह भी कि वे शॉर्ट फिल्म के इस फॉर्मेट में भी कमाल हैं। इन दिनों यूट्यूब पर बॉलीवुड कलाकारों को साथ लेकर कई छोटी फिल्में रिलीज हो रही हैं। इन ज्यादातर फिल्मों में अच्छे कलाकार तो हैं ही, साथ ही इनकी कहानी सस्पेंस थ्रिलर है या कॉमेडी सो इन्हें जबर्दस्त हिट भी मिल रहे हैं। निर्देशक अधिराज बोस ऐसी ही फिल्म ‘इंटीरियर कैफे नाइट’ दो प्रेमी जोड़ों के बिछड़ने और फिर मिलने की कहानी है। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह की ही फिल्म ‘इकबाल’ से प्रसिद्ध हुई श्वेता बसु प्रसाद भी हैं।

सम्मान
नसीरूद्दीन शाह को 1987 में पद्म श्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है। 1979 में फिल्म ‘स्पर्श’, 1984 में फिल्म ‘पार’ और 2006 में फिल्म ‘इकबाल’ के लिए नसीरुद्दीन शाह को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा 1981 में फिल्म ‘आक्रोश’, 1982 में फिल्म ‘चक्र’ और 1984 में ‘मासूम’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्मफेयर अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। 2000 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया।



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