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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

पुष्पा दासी - संतुष्टि की मुस्कान

पुष्पा दासी को अहसास ही नहीं था कि उसे जिस शांति की तलाश थी, वह वृंदावन में मिलेगी

पश्चिम बंगाल के जिले पश्चिम मेदिनीपुर की रहने वाली पुष्पा दासी, 4 साल पहले हमेशा के लिए वृंदावन आ गई। ऐसा नहीं था कि उन्हें अपने बेटे या उसकी पत्नी से कोई शिकायत थी। हां, कुछ मतभेद जरूर थे, जैसे कि हर घर में होते हैं, लेकिन वे इतने भी बड़े नहीं थे कि कोई बड़ा और कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूर हो जाए।
पुष्पा दासी को घर छोड़ने के लिए किस चीज ने मजबूर किया, यह उन्हें तब तक नहीं पता चला जबतक उन्होंने घर छोड़ नहीं दिया। पुष्पा दासी तब 11 साल की छोटी लड़की थी, जब उनकी शादी 22 साल के लड़के से हुई। उसका परिवार बहुत गरीब था। उसका पति एक भिखारी था। इसीलिए आर्थिक स्थिति हमेशा खराब रही। ऊपर से, समय के साथ उसने चार बेटियों और दो बेटों को जन्म दिया, जिनमें से एक लड़का बहुत ही कम उम्र में मृत्यु का ग्रास बन गया। 7 लोगों के परिवार का गुजारा, भीख मांग कर करना बहुत मुश्किल था।
हालांकि, उसका पति लगातार कोशिश कर रहा था। साथ ही पुष्पा भी। समझौते की जिंदगी उनकी रोज की दिनचर्या बन गई थी। उनकी स्थिति खराब थी, लेकिन वे दिल से अमीर थे और उनके परिवार ने भी बड़े दिल के साथ जीना सीख लिया था। मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ,वे छोटी-छोटी चीजों को संभाल रहे थे।
लेकिन, पुष्पा और उसके परिवार के मुश्किल दिन सिर्फ यहीं तक नहीं थे, जिंदगी को अभी उन्हें और भी बहुत कुछ दिखाना था। और इस बार परेशानी घातक कैंसर के रूप में आई, जिसने पुष्पा के पति को हमेशा के लिए जकड़ लिया। गरीब परिवार,यह जानकर दहल गया था। परिवार का मुखिया, आय का एकमात्र स्रोत और परिवार का स्तंभ, जिंदगी छीन लेने वाली बीमारी से पीड़ित था। और फिर अंत में, वही हुआ जो भाग्य बनकर आया था। पुष्पा के पति की मृत्यु हो गई, वह विधवा हो गई और उसके बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया।
उस दर्दनाक दौर को याद करते हुए पुष्पा कहती हैं कि कैंसर ने मेरे पति को मार डाला। हम क्या कर सकते थे? हम गरीब थे। एक गरीब ऐसी बड़ी बीमारियों से नहीं लड़ सकता है। हम जानते थे कि वह जल्द ही या कुछ वक्त बाद मर जाएंगे। और यही हुआ। हमारे गरीब परिवार की जो हिम्मत और ताकत था, वही हमें छोड़ के चला गया। मैं टूट गई थी।
लेकिन कहते हैं कि जहां चाह, वहां राह। पुष्पा का परिवार भले ही गरीब रहा हो या अब पहले से भी अधिक मुफलिसी में जी रहा हो,लेकिन पुष्पा ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि वह अपने पांच बच्चों को कम से कम, बेहतर भविष्य जरूर देगी। वह जो कुछ भी कमाती थी, उसे अपने बच्चों पर खर्च कर देती थी। साथ ही, उसने सुनिश्चित किया कि बच्चों को खाना मिले और उनकी अच्छे से देखभाल हो। कठिनाईयों भरे दिनों और संघर्षों में जीवन बिताते हुए, पुष्पा किसी तरह अपनी बेटियों की शादी और उसके बाद बेटों की शादी करने में कामयाब रही।
पुष्पा कहती हैं कि मेरी बेटियों की शादी बहुत सादे-समारोह जैसी थी। हम गरीब हैं। इसीलिए ऐसा ही होना चाहिए था। लेकिन अगर मेरे पति जिंदा होते, तो यह बेहतर तरीके से हो सकती थी। लेकिन अब यह मायने नहीं रखता है। क्योंकि उनकी शादी हो चुकी है। पुष्पा ने बाद के दिन अपने बेटे और बहू के साथ रहते हुए बिताए। पुष्पा और उसके बेटे और बहू के बीच कभी कोई मनमुटाव नहीं रहा, लेकिन फिर भी पुष्पा बेचैन रहती थी।
एक दिन वह अपनी एक बेटी के पास गई, जो विवाह के बाद मथुरा में रह रही थी। उसने सोचा कि शायद जगह बदलने से उसके अधीर मन को कुछ शांति मिलेगी। पुष्पा कहती हैं कि मेरी बेटी मुझे वृंदावन ले गई। पवित्र शहर की आभा ने मुझे आकर्षित किया। मुझे अपने मन में एक अनपेक्षित हल्कापन और दिल में खुशी महसूस हुई। मुझे अचानक से लगा कि यह वही है,जिसकी मैं इतने दिनों से चाह में थी। शायद मैं यहीं से संबंध रखती हूं। इसीलिए, पुष्पा ने वहीं रहने का फैसला किया। लगातार उसके अनुरोध पर उसकी बेटी पुष्पा को विधवा-आश्रम ले गई। तब से वह पूर्ण संतुष्टि के साथ एक ऐसे आश्रम में रहती हैं जहां उन्हें सुलभ की तरफ से तमाम तरह की सुविधाएं और सहयोग मुहैया कराया जाता है।
पुष्पा बताती हैं कि मैं जन्म से ही गरीब थी। मैं गरीब जीवनशैली की आदी थी। इस बात ने मुझे कभी परेशान नहीं किया। लेकिन मुझे लगता है कि मेरे अंदर हमेशा एक बेचैनी सी रही। मेरा मन शांति की तलाश में था। और जब मैं वृंदावन आई, तो आखिरकार मुझे वह शांति मिली। मुझे अब संघर्ष नहीं करना है। रहने के लिए एक शांत जगह है,अच्छे लोगों के साथ भजन गाना है,भूख को संतुष्ट करने के लिए उचित भोजन की व्यवस्था भी है। ‘लाल बाबा’ (डॉ. विन्देश्वर पाठक) सबका पूरा ख्याल रखते हैं। कोई और कठिनाइ नहीं, कोई और चिंता नहीं...।



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