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गुरुवार, 16 अगस्त 2018

अनुपम मिश्र - प्रकृति में लीन हुआ अनुपम पर्यावरणविद

मन से, वचन से, कर्म से, ध्यान से, धारणा से गांधीवादी सिद्ध और प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र 68 वर्ष की आयु में प्रोस्टेड कैंसर से जूझते हुए 19 दिसंबर को दिवंगत हो गए।

मन से, वचन से, कर्म से, ध्यान से, धारणा से गांधीवादी सिद्ध और प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र 68 वर्ष की आयु में प्रोस्टेड कैंसर से जूझते हुए 19 दिसंबर को दिवंगत हो गए। रहन-सहन में, वस्त्रों तक में साधारण, निर्लिप्त, निराभिमानी। सन 1993 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब’ विश्व की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में से एक है जिसका ब्रेललिपि समेत विश्वकी प्राय: सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। हिंदी के सुख्यात कवि भवानी प्रसाद मिश्र उनके पिताश्री थे और अनुपम थे योग्य पिता के अनुपम संतान। जन्म गांधीवाद के प्रसिद्ध केंद्र सेवाग्राम, वर्धा, महाराष्ट्र में 1984 में, कर्म गांधी शांति प्रतिष्ठान में हुआ कर्मक्षेत्र भी गांधी शांति प्रतिष्ठान, आवास राजघाट के आवासीय परिसर में, अंतिम दिन तक वहीं रहे और अंतत: अंतिम सांस एम्स, नई दिल्ली में! जय प्रकाश नारायण गांधी शांति प्रतिष्ठान प्राय: आया करते थे। वहीं से जेपी के संपर्क में आए। एक बार जेपी का एक पत्र लेकर उन्हें राजस्थान जाना पड़ा। जलाभाव के मारे राजस्थान में मेजबान के प्रांगण में कुंड बना कर वर्षा जल के संरक्षण का अद्भुत दृश्य देखा। जल पीकर देखा, अमृत तुल्य! तब से जल की समस्या को लेकर ही समर्पित होकर रह गए। दिल्ली समेत देश के अधिसंख्य जलाशयोंकी जन्मपत्रियां उनके नख-दर्पण में थीं। वे एक कुशल फोटोग्राफर थे। राजस्थान के गांवों के जल-संकट या सरंक्षण के एक से बढ़ कर एक दुर्लभ चित्र, ऊंट समेत 12-13 व्यक्तियों द्वारा एक घड़ा जल निकालने में जुटे रहने का दुनिया को हैरान कर देने वाला चित्र भी...जल ही नहीं, पर्यावरण से जुड़े किसी भी विषय पर वे धाराप्रवाह बोल सकते थे। एक कुशल लेखक, एक कुशल संपादक अनुपम जी सहज भाषा के धनी थे। पर्यावरण के प्रति उनकी शुरू से ही रुझान रही। 1972 में ही उन्होंने 'मिट्टïी बचाओ’ पुस्तिका लिखी थी। बाद में 'राजस्थान की रजत बूंदे और हमारा पर्यावरण’ आदि पुस्तकें भी। ध्यातव्य है कि उन्होंने किसी भी पुस्तक की कॉपी राइट नहीं रखी। सभी मुक्त। जो चाहे छापे, जो चाहे पढ़े। 'आज भी खरे हैं तालाब’ फ्रेंच भाषा में अनुदित होकर पढ़ाया जाता है। पुस्तक से प्रेरणा लेकर बंगाल, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र में सैकड़ों तालाब खोदे गए। उनका कोई घर न था, ना पोशाकों के प्रति कोई मोह, एक तरह से फकीरी बाना! मोबाइल तक का मोह नहीं। मोह सिर्फ एक- समर्पित सेवा! हालांकि देश की प्राय: सभी बड़ी हस्तियों ने उनकी मृत्यु पर शोक-संदेश भेजे हैं। मगर उनके जल संरक्षण और पर्यावरण के संदेश को कौन चरितार्थ करेगा-यह देखना अभी बाकी है।



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