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मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

गीतांजलि बब्बर और रितुमोनी दास - इस रिश्ते को क्या नाम दें

दिल्ली का रेड लाइट एरिया जीबी रोड एक बदनाम और असुरक्षित जगह है, लेकिन गैर-सरकारी संगठन 'कट्कथा’ की संस्थापक गीतांजलि बब्बर और रितुमोनी दास ने इसे अपनी कर्मभूमि बना ली है। यहां की सेक्स वर्कर्स के बीच काम करने वाली इन सामाजिक कार्यकर्ताओं से स्फूर्ति मिश्रा की बातचीत के अंश

काम करने वाली इन सामाजिक कार्यकर्ताओं से स्फूर्ति मिश्रा की बातचीत के अंश कट्कथा की स्थापना की प्रेरणा कैसे मिली?

गीतांजलि : जब मैं 2011 में नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाईजेशन के लिए काम करती थी, तो मेरा जीबी रोड आना-जाना लगा रहता था। मैं यहां काम करने वाली औरतों से परिवार नियोजन, गर्भ निरोधक से जुड़े सवाल पूछती थी। लेकिन मुझे यह बातें पूछना अच्छा नहीं लगता था, क्योंकि न वो औरतें मुझे जानती थीं और न मैंï उन्हें? इसीलिए इतने निजी प्रश्न पूछना अजीब लगता था, लेकिन यही मेरा काम था, इसीलिए करना पड़ता था। एक दिन उनमें से एक ने मुझसे निजी सवाल पूछा। मैं जवाब नहीं दे पाई। तब उस महिला ने मुझसे कहा कि जब तुम अपनी जिंदगी की बातें हमसे साझा नहीं करती हो, तो तुम्हें हमसे पूछने का भी अधिकार नहीं है। उसी पल मुझे लगा कि मुझे उन औरतों के लिए कुछ करना है, सिर्फ सवाल पूछने से बात नहीं बनेगी। उनमें से एक ने कहा कि वह पढऩा चाहती थी। बस, मेरा जीबी रोड आने-जाने का सिलसिला बन गया। धीरे-धीरे मेरे और इनके बीच एक प्यार और दोस्ती का रिश्ता बन गया। मैंने अपने दोस्तों से इस बारे में बात की, तो वे भी सहयोग करने के लिए तैयार हो गए। फिर हमने यहां स्किल डेवलपमेंट के कार्यक्रम शुरू किए, जिसमें इन महिलाओं को पढऩा, लिखना, कढ़ाई करना, टेलरिंग और ब्यूटीशियन का कोर्स सिखाया गया। पहले सिर्फ औरतें आतीं थीं, लेकिन बाद में उनके बच्चे भी पढऩे के लिए आने लगे। किसी दोस्त ने कट्कथा नाम सुझाया, जिसका मतलब है कठपुतलियों की कथा।

जीबी रोड के बच्चों को चुनने की कोई खास वजह? बच्चे तो सड़कों पर भी बुरे हाल हैं, भीख मांगते हैं?

गीतांजलि : मैंने बहुत-सी संस्थाओं के लिए काम किया, लेकिन जब यहां आई तो लगा कि यहीं काम करना है। इसीलिए मैंने यहां काम करना ठीक समझा और अब यह जगह मेरी जिंदगी का एक खास हिस्सा बन चुकी है ।

कम उम्र में ऐसी सफलता पाना कैसा लगता है?

गीतांजलि : मुझे कितने भी अवाडï्र्स क्यों न मिल जाएं, लेकिन अगर मैं इन लोगों की जिंदगी में बदलाव न ला पाई तो सब बेकार है। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या वाकई मैं सफल हूं? तो जवाब मिलता है कि पूरे देश में लाखों सेक्स वर्कर्स हैं। जब तक मैं इस पेशे की परेशानियों से इनको और इनके बच्चों को मुक्त न करा दूं, तब तक मैं खुद को सफल नहीं मान सकती।

जीबी रोड पर ही 4000 परिवार हैं? इनको लेकर आपका क्या एजेंडा है?

गीतांजलि : मुझे नहीं पता कि मीडिया में कैसे ये बातें फैल जाती हैं। यह एक बड़ा आंकड़ा है। मैंने कभी ऐसी कोई कमिटमेंट नहीं की। इन लोगों को मुक्त कराना बहुत जोखिम भरा है। कभी-कभी हमारी जान को भी खतरा होता है। इसीलिए मैं ऐसा कोई वादा नहीं करती, लेकिन कोशिश जरूर करती हूं कि ज्यादा से ज्यादा औरतों को इस पेशे से मुक्तिदिला सकूं।

आप इनकेबारे में नीति बनाने वालों को किस तरह प्रभावित करती हैं? 

रितु : जब हमने काम शुरू किया था, तो लोग इस बात पर भी विश्वास नहीं करते थे कि कोठे सच में होते हैं। लेकिन धीरे-धीरे हमें प्रशासन का सहयोग मिलने लगा है। हमें सबसे बड़ी सफलता तब मिली, जब हमने इन महिलाओं के पहचान पत्र बनवाए और बैंक में खाते खुलवाए। अब इनके पास सभी सरकारी कागजात जैसे पैन कार्ड, बैंक पासबुक वगैरह हैं। इन्हें साल में एक दिन खास तौर पर 15 अगस्त की सरकारी छुट्टी दिलाना फिलहाल हमारा मुख्य एजेंडा है। इन्हें साल में एक दिन की भी छुट्टी नसीब नहीं होती।

क्या सेक्स वर्कर्स को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए? क्या ऐसा करने से लड़कियों का अपहरण कर वेश्यावृत्ति में धकेले जाने की घटनाओं में कमी आएगी?

रितु : नहीं, बल्कि उसका उल्टा ही होगा। कोठे के मालिकों को कानून को धोखा देने में और आसानी हो जाएगी। वे इन बच्चियों को हार्मोनल इंजेक्शन लगते हैं। यहां 13-14 साल की बच्चियां 18-19 की लगती हैं। वे यह बात आसानी से साबित कर देंगे कि ये लड़कियां बालिग हैं और अपनी मर्जी से इस पेशे में आई हैं। आप हर लड़की का बोनमेरो टेस्ट नहीं करा सकते। इन लड़कियों को अपने अधिकारों के बारे में पता ही नहीं है, तो कानूनी-गैर कानूनी से क्या फर्क पड़ता है। इनका गैंग पुलिस और सरकारी एजेंसियों से भी ज्यादा ताकतवर हैं। 

सरकार और समाज का इनके प्रति क्या नज़रिया है?

रितु : सरकार अब काफी हद तक सहयोग देती है, खास तौर पर पुलिस। अब पुलिस उनकी शिकायतें भी रजिस्टर करती है। पहले ऐसा होना बहुत मुश्किल था। ज़ाहिर है, समाज का नज़रिया उनके प्रति अच्छा नहीं है। उनके बच्चे पास के सरकारी स्कूल में पढऩे जाते हैं, तो दूसरे बच्चे उन्हें तंग करते हैं। एक ट्रैफिक सिग्नल इस इलाके को दो विपरीत समाज में विभाजित कर देता है-एक सभ्य समाज और दूसरा यह इलाका। हम इस नज़रिए को बदलना चाहते हैं।

पुलिस वेश्यालयों के मालिकों पर कार्रवाई करने में क्यों हिचकिचाती है?

रितु : वे एक्शन लेते हैं, लेकिन इन औरतों का पुनर्वास बड़ा सवाल है। अगर ये औरतें पकड़ी जाती हैं, तो मालिक उन पर दबाव डाल कर आसानी से यह साबित कर देता है कि ये अपनी मर्जी से यह काम कर रही हैं या फिर उन्हें कहीं छुपा दिया जाता है और मालिक आसानी से कानून से बच निकलते हैं।

कट्कथा का विज़न क्या है? क्या आप दूसरे रेड लाइट एरिया में भी काम करने के बारे में सोच रही हैं?

रितु : अगले 10 सालों तक तो नहीं। सिर्फ 6 स्थाई सदस्य और बेहद कम संसाधन में हमारे लिए काम करना बहुत मुश्किल रहता है। यह रेड लाइट एरिया ही काफी बड़ा है। इसीलिए हम चाहते हैं की दूसरी संस्थाएं भी हमारे साथ जुड़ें और इस दिशा में काम करें।

कट्कथा की सोच क्या है? आप इसके लिए फंड्स कैसे जुटाती हैं?

रितु : हमारी सोच है कि वेश्यावृत्ति का काम पूरी तरह खत्म हो जाए। हमें मालूम है कि दूसरे एरिया में भी कोठे हैं। हमारे कुछ वालंटियर्स मजनू का टीला, शास्त्री पार्क यहां तक कि सोनागाछी में भी काम कर रहे हैं। फंड्स जुटाने में दिक्कत होती है। इसीलिए हम एक बार में एक ही एरिया पर फोकस करते हैं।

आपने अब तक कितनी औरतों को इस पेशे से मुक्ति दिलाई और कितनी दूसरा कैरियर चुनने में सफल हुई हैं?

रितु : लगभग 10 में से 4 महिलाएं सफलतापूर्वक दूसरे क्षेत्रों में हाथ आजमा रही हैं। हमने मैत्री किचेन सर्विस भी शुरू की है। ये औरतें खाना बनाती हैं और 60 रुपए प्रति डब्बे के हिसाब

से सर्विस देती हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इनकी पृष्ठभूमि को जानते हुए भी लोग इन्हें स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन अभी हमें लंबा सफर तय करना है।



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