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मंगलवार, 17 जुलाई 2018

जेसी कुमारप्पा - अनर्थ से बचाएगा गांधी का 'अर्थ’

गांधी एक विचारक और दार्शनिक के साथ बड़े अर्थशास्त्री भी थे। उनके अर्थशास्त्र के मूल्य ग्रामीण भारत की सशक्तता से कैसे जुड़े थे, इसके सबसे प्रामाणिक व्याख्याकार हैं कुमारप्पा

मानवाधिकार की वकालत आजकल खूब होती है और यह वकालत घर-परिवार से लेकर शिक्षा और अर्थ के क्षेत्र में भी कई तार्किक दरकारों को अमल में लाने का दबाव पैदा कर रही है। हालांकि यह भी एक विरोधाभास ही है कि एक ऐसे दौर में जिसके लिए चरम उपभोग का परम दौर’ जैसा जुमला इस्तेमाल किया जाता है, मनुष्य के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर कई तरह की मुहिम चल रही है, संघर्ष हो रहे हैं, मानवीय गरिमा और अस्मिता की स्फीति के जघन्य आख्यान भी उसी दौर में लिखे जा रहे हैं। बात गांधी की करें तो वे स्वराज से लेकर व्यक्ति और समाज तक हर जगह मानवीय अस्मिता की बात करते थे। उनके लिए इस अस्मिता की कसौटी हर बार एक ही थी-अहिंसा और अंतिम जन। लिहाजा यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि आज जब हम विकास और होड़ के साझे को एक साथ जी रहे हैं तो गांधी की अर्थनीति क्या कहती है। इसमें पहली एहतियात तो यही जरूरी है कि गांधी के अहिंसा दर्शन से उनकी अर्थनीति को अलगाकर नहीं देखा जा सकता। यह एक समवेत दृष्टि है, जिसमें एक तरफ तो मानवीय अस्मिता को सबसे कठोर निकष पर कसे जाने की वो वकालत करते हैं, वहीं दूसरी तरफ संयम से स्वावलंबन और सहअस्तित्व तक का पाठ पढ़ाते है। यही वजह है कि गांधी ने जो राष्ट्र निर्माण की कल्पना की थी, उसे उनके आलोचक उनके समय से ही अव्यावहारिक और थोथा आदर्शवाद भी बताते रहे हैं।

गांधी के अनन्य और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेसी कुमारप्पा की एक किताब है-'द इकोनमी ऑफ परमानेंस’। अहिंसक जीवनमूल्यों के प्रति आस्थावान दुनियाभर के आर्थिक विद्वानों के बीच इस किताब को बाइबिल सरीखा दर्जा हासिल है। इस किताब के पहले अध्याय में ही कुमारप्पा इस मिथ को तोड़ते हैं कि अर्थ और विकास कभी स्थायी हो ही नहीं सकते। औद्योगिक क्रांति से लेकर उदारीकरण तक का अब तक हमारा अनुभव यही सिखाता है कि विकास की दरकार और उसके मानदंड बदलते रहते हैं। इसी लिहाज से सरकार और समाज भी अर्थ और विकास को लेकर अपनी प्राथमकिताओं में हेरफेर भी करते रहते हैं। पर इस बदलाव का अंतिम लक्ष्य क्या है, इसको लेकर कोई गंभीर सोच कभी सामने नहीं उभरी। जो सोच हर बार सतह पर दिखी, वह यही कि बचेगा वही, टिकेगा वही, जो ताकतवर होगा। अर्थशास्त्रीय शब्दावली में इसके लिए जो सैद्धांतिक जुमला इस्तेमाल होता है, वह है- सर्ववाइवल ऑफ द फिटेस्ट। इस दृष्टि में मानवीय करुणा और अस्मिता के लिए कितना स्थान है, समझा जा सकता है। यह समृद्धि और विकास की हिंसक दृष्टि है। एक ऐसी दृष्टि जो बूट पहनकर दूसरों को रौंदते हुए सबसे आगे निकल जाने की सनक से हमें लैस करती है।

आज अमत्र्य सेन और ज्यां द्रेज सरीखे अर्थशास्त्री जिस कल्याणकारी विकास की दरकार को सामने रखते हैं, उसके पीछे का तर्क कुमारप्पा की आर्थिक अवधारणा की ही देन है। अलबत्ता यह देन हमें गांधी के करीब तो जरूर ले जाती है, पर उनसे सीधे जुडऩे से परहेज भी बरतती है। यह परहेज कोई चालाकी है, ऐसा भी नहीं है। गांधी और उनके मूल्यों को लेकर नई व सामयिक व्याख्या रचने वाले सुधीर चंद्र इस परहेज को अपनी तरह से एक 'असंभव संभावना’ के तौर पर देखते हैं। यानी सत्य, प्रेम और करुणा के दीए सबसे पहले मन में जलाने का आमंत्रण देने वाले गांधी के पास आधे-अधूरे मन से जाया भी नहीं जा सकता, क्योंकि फिर वो सारी कसौटियां एक साथ हमें सवालों से बेध डालेंगी, जो गांधी की नजरों में मानवीय अस्मिता की सबसे उदार और उच्च कसौटियां हैं। इस विरोधाभास को और समझना हो और सीधे-सीधे विकास, स्वावलंबन और उपार्जन को लेकर गांधीवादी आर्थिक सैद्धांतिकी की बात करनी हो तो कुमारप्पा की किताब सबसे बेहतर और समाधानकारी जरिया है।

कुमारप्पा अपनी किताब 'द इकोनमी ऑफ परमानेंस’ में साफ करते हैं कि विकेंदित स्तर पर 'संभव स्वाबलंबन’ को मूर्त ढांचे में तब्दील किए बिना देश की आर्थिक सशक्तता की मंजिल हासिल नहीं की जा सकती है। भारतीय ग्रामीण परंपरा और संस्कृति में सहअस्तित्व और स्वावलंबन का साझा स्वाभाविक तौर पर मौजूद है। दुर्भाग्य से विकास को शहरीकरण की रोशनी में पढऩे वाले नीतिकारों को यह साझा या तो दिखता नहीं है या फिर इसके महत्व को वे समझ नहीं पाते। जो ग्रामीण जीवन महज कुछ कोस की दूरी पर अपनी बोली और पानी के इस्तेमाल तक के सलूक में जरूरी बदलाव को सदियों से बरतता रहा है, उसे यह अक्ल भी रही है कि उसकी जरूरत और पुरुषार्थ को एक जमीन पर खड़ा होना चाहिए। गैरजरूरी लालच से परहेज और मितव्ययिता ग्रामीण स्वभाव का हिस्सा है। पर बदकिस्मती देखिए कि इस स्वभाव पर रीझने की जगह इसे विकास की मुख्यधारा से दूरी के असर के रूप में देखा गया। नतीजतन एक परावलंबी विकास की होड़ उन गांवों तक पहुंचा दी गई, जो स्वावलंबन को अपनी जीवन जीने की कला मानते थे।

गांधी 'हिंद स्वराज’ में बड़ी लागत, बल्कि प्रोडक्शन, मशीनीकरण इन सब का विरोध एक स्वर में करते हैं। कुमारप्पा के शब्दों में कहें तो जीवन, संस्कृति और पुरुषार्थ का साझा बनाए रखना इसीलिए जरूरी है क्योंकि इससे विकास और स्वावलंबन के अस्थायी या गैर टिकाऊ होने का संकट नियंत्रित होता है। कुमारप्पा इसीलिए इकोनमी के परमानेंस यानी स्थायित्व की बात भी करते हैं। कुमारप्पा का अर्थशास्त्र स्वतंत्र भारत के हर व्यक्ति के लिए आर्थिक स्वायत्तता एवं सर्वांगीण विकास के अवसर देने के उसूल पर आधारित है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसके प्राकृतिक स्वरूप को उन्नत करने के हिमायती कुमारप्पा ऐसे विरले अर्थशास्त्री रहे, जो पर्यावरण संरक्षण को औद्योगिक-वाणिज्यिक उन्नति से कहीं अधिक लाभप्रद मानते थे।

यह बात आज कई ऐतिहासिक संदर्भों से जाहिर है कि गांधी के समय में भी उनके आर्थिक दर्शन से उनके ज्यादातर सहयोगी पूरे तौर पर सहमत नहीं थे। इसीलिए बाद में भी स्वतंत्र भारत की आर्थिक नीतियों और गांधीवादी आर्थिक नीतियों-तकाजों के बीच कोई सामंजस्य नहीं बन पाया।

गांधी जिस ग्राम स्वराज की बात करते हैं उसकी रीढ़ है कृषि और ग्रामोद्योग। इसे ही विकेंद्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया। गांधी ने कृषि अर्थव्यवस्था में भारत के चिरायु स्वावलंबन के बीज देखे थे। ऐसा भला होता भी क्यों नहीं क्योंकि वे दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर सबसे पहले गांवों की तरफ गए, किसानों के बीच खड़े हुए। चंपारण सत्याग्रह इस बात की मिसाल है कि गांधी स्वराज की प्राप्ति के साथ जिस तर्ज पर अपने सपनों के भारत को देख रहे थे, उसमें किसान महज हरवाहा-चरवाहा या कुछ मु_ी अनाज के लिए चाकरी करने वाले नहीं थे बल्कि देश के स्वावलंबन का जुआ अपने कंधों पर उठाने वाले पुरुषार्थी अहिंसक सेनानी थे।

कुमारप्पा विदेश से अर्थशास्त्र की पढ़ाई करके गांधी के पास आए थे। गौरतलब है कि कोलंबिया विश्वविद्यालय में सार्वजनिक वित्त का अध्ययन करने के दौरान प्रख्यात अर्थशास्त्री एडविन सेलिग्मन के मार्गदर्शन में उन्होंने 'सार्वजनिक वित्त एवं भारत की निर्धनता’ विषय पर पर महत्वपूर्ण शोधपत्र लिखा था, जिसमें भारत की आर्थिक दुर्दशा में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों से हुए नुकसान का अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन के दौरान ही कुमारप्पा ने पाया कि भारत की दयनीय आर्थिक स्थिति का मुख्य कारण ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की अनैतिक और शोषक नीतियां हैं। भारत लौटकर जब वे गांधी से मिले तो उन्होंने कुमारप्पा को गांवों के स्वावलंबन के लिए कृषि और ग्रामोद्योग की दरकार समझाई। गांधी की सीख कुमारप्पा के मन और चिंतन के करीब तो थी ही, उन्हें इसमें अपने अंदर के कई सवालों का समाधान भी मिला। जाहिर है, वे गांधी से गहरे तौर पर प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने कृषि और ग्रामोद्योग की दरकार को गांधी की अहिंसक आर्थिक सैद्धांतिकी के रूप में गढ़ा, जिसमें शोषण की जगह सहयोग और उपभोग की जगह जरूरी आवश्यकता को उन्होंने सबसे बड़ी कसौटी माना। सहयोग और आवश्यकता की इस कसौटी से स्वावलंबी आर्थिक स्थायित्व को तो पाया ही जा सकता है, प्राकृतिक असंतुलन जैसे खतरे से भी बचा जा सकता है।

विकास को होड़ की जगह सहयोग के रूप में देखने वाली गांधीवादी दृष्टि विकास और जीवन मूल्यों को अलगा कर नहीं बल्कि साथ-साथ देखती है। यही वजह है कि भारत में शहरी खपत और आयात के लिए जब पहली बार गन्ना खेती की होड़ मची और किसानों को इसके निर्यात और बढ़ी आमदनी का लालच दिया गया तो कुमारप्पा ने न सिर्फ इसका विरोध किया बल्कि वे इसके लिए आंदोलन तक पर उतारू हो गए। उन्हें साफ लगा कि इससे भारत की विकेंद्रित आर्थिक संरचना पूरी तरह परावलंबी हो जाएगी और ग्रामीण किसान-मजदूर शोषण के शिकार होंगे। कुमारप्पा की तब की आशंका आज के भारत की कितनी बड़ी भयावह सच्चाई बन गई है, कहने की जरूरत नहीं।



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