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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

तारा पाटकर - संस्थापक, रोटी बैंक

महोबा में अब कोई भूखा नहीं सोता

भुखमरी के लिए दुनियाभर में बदनाम बुंदेलखंड, 'रोटी बैक’ के जरिए न केवल लोगों की भूख मिटा रहा है, बल्कि हजारों लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत भी बन गया है। दस साथियों के साथ मिलकर इस अनोखे रोटी बैंक की शुरुआत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता तारा पाटकर से सुलभ स्वच्छ भारत के प्रसन्न प्रांजल की बातचीत

 

कैसे आया आइडिया?

मैंने 20 साल से ज्यादा समय तक पत्रकारिता की है। अक्सर मैं फुटपाथ, सड़कों, चौराहों और बाजारों में भूख से बिलखते लावारिस लोगों को देखता था। हमेशा उनके बारे में सोचा करता था कि वह खाना कहां से खाते हैं? हर दिन कौन उन्हें मुफ्त में खाना देता होगा? खाना नहीं मिलने पर ये कैसे भूखे सोते होंगे? ये सभी बातें मुझे काफी परेशान करती थी। मैंने इनके लिए भोजन उपलब्ध कराने का फैसला किया। जैसी मेरी सोच थी, बिल्कुल वैसी ही सोच हमारे बुंदेली समाज संगठन के हाजी मुट्टन, फादर लाभान, अरुण चतुर्वेदी, अजय बरसंईया और कुछ अन्य लोगों की थी। फिर हम सबने मिलकर फैसला किया कि हम गरीबों को मुफ्त में खाना खिलाने के लिए मुहिम शुरू करेंगे और 15 अप्रैल 2015 को हमने इसकी शुरुआत की।

आपने रोटी बैंक नाम क्यों रखा?

बैंकों में तो पैसे जमा होते हैं,लेकिन यहां तो ऐसी बात नहीं, बैंक लोगों की जरूरत पूरी करने का काम करता है। रोटी बैंक भी भूखे लोगों की रोटी की जरूरत पूरी करता है। दरअसल मैं अपने काम की वजह से काफी समय लखनऊ में रहा हूं। वहां पर 'राम-राम बैंक’ नाम से एक बैंक था, जहां पर लोग बुकलेट में रामनाम लिखकर जमा करते थे। मुझे लगा कि जब राम के नाम पर बैंक हैं तो क्यूं न हम लोगों को दो जून की रोटी उपलब्ध कराने वाली संस्था का नाम 'रोटी बैंक’ रखें। मेरी बात से मेरे सभी सहयोगी सहमत हुए और उन्होंने 'रोटी बैंक’ नाम पर मुहर लगा दी।

रोटी बैंक का कैसा रिस्पॉन्स मिल रहा है?

शुरुआत में हम 10 लोगों ने रोटी बैंक की शुरुआत अपने घरों से रोटी लाकर किया था। महज तीन महीने में ही 500 परिवार इससे जुड़ गए। अब तो युवाओं में होड़ लगी रहती है। लगभग 50 समर्पित स्वयंसेवक हर दिन इस काम को कर रहे हैं। लगभग 500 से ज्यादा परिवार हर दिन रोटी की किस्त इस बैंक में जमा कर रहे हैं और हर दिन लगभग 1000 लोगों को मुफ्त में खाना दिया जा रहा है। समाज के असहाय, विकलांग, जरूरतमंद लोगों के जीवन से खाने का तनाव खत्म हो गया है। कई बार कुछ अच्छे परिवार के लोग भी खाने के लिए रोटी बैंक की तरफ आ जाते हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि बुंदेलखंड में खासकर महोबा में आज कोई इंसान भूखा नहीं सोता है।

किन परेशानियों का सामना करना पड़ा

शुरुआती दिनों में जब जरूरतमंदों को खाना देने जाते थे तो उसमें कई लोग खाना लेने से मना कर देते थे। शक की निगाहों से देखते थे। उन्हें लगता था कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए हमलोग ऐसा कर रहे हैं। रेलवे स्टेशन पर पुलिस नशाखुरानी गिरोह के डर से लोगों को मुफ्त में खाना देने नहीं देती थी। हमने काफी कोशिश की, पुलिस वाले और जरूरतमंदों को यह भरोसा दिलाया कि हम केवल खाना खिलाना चाहते हैं, हमारा दूसरा कोई मकसद नहीं है। हमने अपने स्वयंसेवको के लिए आईकार्ड जारी किए और हेल्पलाइन भी जारी किए।

धीरे-धीरे लोगों में भरोसा जगा और ये जरूरतमंद लोग खाने की पैकट लेने लगे। आज के समय में इन जगहों पर रहने वाले भूखे, जरूरतमंद हर दिन सुबह-शाम खाने के इंतजार में रोटी बैंक के स्वयंसेवकों की राह देखते रहते हैं।

मदद कहां से मिलती है?

'रोटी बैंक’ के बारे में लोगों को पता चलने पर काफी लोग इसकी मदद के लिए आगे आए। देश के कोने-कोने से और स्वीडन, अमेरिका, कनाडा और कई अन्य देशों से आर्थिक मदद करने वाले लोगों के कॉल आए। हमारा मकसद लोगों को केवल खाना मुहैया कराना है, इसीलिए हमने आर्थिक मदद लेने से मना कर दिया। सभी मदद करने वालों को मैंने यही कहा कि अगर आप मदद करना चाहते हैं तो अपने आस-पास किसी को भूखा नहीं रहने दें। अपने इलाके के लोगों को दो जून की रोटी दिलवा दें। इससे बड़ी बात कुछ नहीं होगी।

समाज को क्या संदेश देना चाहते हैं?

हमारा मकसद है भुखमरी समाप्त करना। हम चाहते हैं कि कोई भूखा न रहे, कोई भूखा न सोए। हमें बहुत सारे लोगों ने रोटी बैंक का ब्रांच खोलने के लिए संपर्क किया। हमने सबसे यही कहा कि आप अपने यहां खुद से शुरुआत कीजिए। रोटी बैंक के नाम का इस्तेमाल कीजिए और भूखे, जरूरतमंदों की मदद करें। मुझे काफी खुशी और संतोष का अनुभव होता है कि आज देशभर में 100 से ज्यादा रोटी बैंक खुल चुके हैं और आए दिन लोग इस तरफ आगे बढ़ रहे हैं। अगर लोग इसी तरह से आगे बढ़कर योगदान देते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे समाज में, हमारे देश में कोई भूखा नहीं रहेगा। 



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