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रविवार, 18 नवंबर 2018

ईरान की लोककथा - जैसे को तैसा

एक जमींदार के लिए उसके कुछ किसान एक भुना हुआ मुर्गा और एक बोतल फल का रस ले आए। जमींदार ने अपने नौकर को बुलाकर चीजें उनके घर ले जाने को कहा। नौकर एक चालाक, शरीर लड़का था। यह जानते हुए जमींदार ने उससे कहा,'देखो, उस कपड़े में जिंदा चिडिय़ा है और बोतल में ज़हर है। खबरदार, जो रास्ते में उस पकड़े को हटाया, क्योंकि अगर उसने ऐसा किया तो चिडिय़ा उड़ जाएगी। और बोतल सूंघ भी ली तो तुम मर जाओगे। समझे?’ नौकर भी अपने मालिक को खूब पहचानता था। उसने एक आरामदेह कोना ढूंढा और बैठ कर भुना मुर्गा खा गया। उसने बोतल में जो रस था वह भी सारा पी डाला। एक बूंद भी नहीं छोड़ा। उधर जमींदार भोजन के समय घर पहुंचा और पत्नी से भोजन परोसने को कहा। उसकी पत्नी ने कहा, 'जरा देर ठहरो। खाना अभी तैयार नहीं है।’ जमींदार ने कहा, 'मैंने जो मुर्गा और रस की बोतल नौकर के हाथ भेजी थी, वही दे दो। वही काफी है।’ उसके गुस्से की सीमा न रही जब उसकी पत्नी ने बताया कि नौकर तो सुबह का गया अभी तक लौटा ही नहीं।

बिना कुछ बोले गुस्से से भरा जमींदार अपने काम की जगह वापस गया तो देखा नौकर तान कर सो रहा है। उसने उसे लात मार कर जगाया और किसान द्वारा लाई गई भेंट के बारे में पूछा।

लड़के ने कहा, 'मालिक, मैं घर जा रहा था तो इतने जोर की हवा चली कि मुर्गे के ऊपर ढंका कपड़ा उड़ गया और जैसा आपने कहा था, वह भी उड़ गया। मुझको डर लगा कि आप सजा देंगे और मैंने उससे बचने के लिए बोतल में जो जहर था वह पी लिया और अब यहां लेटे-लेटे मौत का इंतजार कर रहा था।’



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