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शनिवार, 21 जुलाई 2018

ओम पुरी - 'अर्द्ध सत्य’ से पूर्ण सत्य तक

समांतर फिल्मों के दौर में एक ऐसा अभिनेता आया, जिसकी आवाज़ में कंपन थी, जिसके अभिनय की कई परतें थी। चार दशकों तक फिल्म-दर-फिल्म ओम पुरी इन्हीं परतों को खोलते रहे और अभिनय की नई इबारत लिखते रहे

अपनी जानदार आवाज के लिए मशहूर 66 वर्षीय अभिनेता ओम पुरी ने कहा था, 'अभिनेता के रूप में दिया गया मेरा योगदान मेरे जाने के बाद पता चलेगा और युवा पीढ़ी खासकर फिल्मों का प्रशिक्षण लेने वाले युवा जब मेरी फिल्में देखेंगे तब उन्हें इसका अहसास होगा।’ किसी को पता नहीं था साक्षात्कार में कहे गए उनके ये शब्द अंतिम साबित होंगे और उनके शब्द इतनी जल्दी वास्तविकता में बदल जाएंगे। इस महान अभिनेता के अचानक इस दुनिया से जाने से उनके प्रशंसकों के साथ-साथ पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लोग लोग सदमे में हैं।

सही मायने में ओम पुरी भारत के पहले ऐसे अभिनेता थे, जिन्होंने वैश्विक सिनेमा की अलग-अलग शैलियों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। बात चाहे थियेटर की हो या टेलीविजन या फिर फिल्म। फिल्मों में भी भारतीय, ब्रिटिश, हॉलीवुड और पाकिस्तानी, हर जगह उन्होंने प्रभावशाली काम किया। उन्होंने हर तरह की भूमिका अदा की। बड़ी हो या छोटी, हीरो, विलेन, कॉमेडियन जैसी तमाम भूमिकाएं उन्होंने कॉमर्शियल और आर्ट फिल्मों में निभाई। उन्होंने अच्छे दिखने वाले हीरो की स्टीरियोटाइप छवि बदलने का बेहतरीन कारनामा किया। अपनी शानदार एक्टिंग के दम पर उन्होंने बॉलीवुड हीरो की 'गुड लुकिंग’ परिभाषा को बदलकर एक नया उदाहरण पेश किया। एनएसडी और एफटीटीआई में सफलतापूर्वक पारी खेलने के बाद 1976 में मराठी फिल्म 'घासीराम कोतवाल’ से बड़े पर्दे पर उनकी एंट्री हुई। इसके बाद सईद मिर्जाके निर्देशन में बनी फिल्म 'अरविंद देसाई की अजीब दास्तान’ (1978) में उन्होंने एक माक्र्सवादी का किरदार निभाया। मिर्जा की 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ (1980) में भी उन्होंने काम किया। लेकिन 1980 में आई फिल्म 'आक्रोश’ में की गई शानदार एक्टिंग से ओम पुरी को फिल्म इंडस्ट्री में एक नई पहचान मिली। गोविंद निहलानी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने पीडि़त आदिवासी लहान्या भीखू का यादगार किरदार निभाया। पूरी फिल्म में चुप्पी साधे रहने वाले हत्या के संदिग्ध आरोपी भीखू की चुप्पी फिल्म के अंतिम दृश्यों में टूटते ही पूरी कहानी में बदलाव आ जाता है। 'आक्रोश’ के बाद

1982 में उनकी फिल्म 'अद्र्ध सत्य’ ने बड़े पर्दे पर धमाल मचाया। देश में राजनीति और अपराध के बीच चल रहे गठजोड़ से जूझते युवा पुलिस अफसर का शानदार किरदार अदा कर अपनी एक्टिंग का लोहा उन्होंने मनवाया। इस फिल्म में की गई शानदार एक्टिंग के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।

अपने समकालीन कलाकारों- नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी और स्मिता पाटिल के साथ वह समानांतर सिनेमा आंदोलन (पैरलल सिनेमा मूवमेंट) के प्रमुख चेहरा थे। 'भूमिका’, 'आक्रोश’, 'स्पर्श’, 'भवनी भवई’, 'मिर्च मसाला’, 'सदगति’, 'आरोहण’ और 'मंडी’ जैसी कई उम्दा फिल्मों (इंडियन क्लासिक फिल्मों)में उन्होंने शानदार अभिनय किया।

कला फिल्मों का दौर (आर्ट फिल्म मूवमेंट) खत्म होने के बाद वह मेनस्ट्रीम सिनेमा की तरफ आ गए। 'जाने भी दो यारो’, 'चाची 420’, 'द्रोहकाल’, 'माचिस’, 'गुप्त’, 'तमस’, 'काकाजी कहिन’, 'भारत एक खोज’ जैसी मेनस्ट्रीम फिल्मों में अपनी शानदार एक्टिंग के दम पर उन्होंने एक से बढ़कर एक यादगार किरदार निभाए। लगभग 300 फिल्मों में काम करने वाले इस महान नायक को 1990 में 'पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया।

हरियाणा के अंबाला में एक रेलवे अधिकारी के घर सातवें संतान के रूप में जन्म लेने वाले ओमपुरी घर में सबसे छोटे थे। शुरुआती दिनों में उन्होंने पंजाब कला मंच थियेटर ग्रप ज्वॉइन किया। इसके बाद देश की प्रतिष्ठित फिल्म 'संस्थान फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ (एफटीटीआई) से उन्होंने फिल्म की बारीकियां सीखी और डिग्री हासिल की। अपने अभिनय को नया मुकाम देने के लिए 'नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ (एनएसडी) से भी उन्होंने प्रशिक्षण लिया। अपने बेस्ट फ्रेंड नसीरूद्दीन शाह के साथ उन्होंने एनएसडी में अपने अभिनय को एक नया आयाम दिया। अपने चार दशक के फिल्मी करियर में उन्होंने कई नेशनल अवॉर्ड और कई समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्मों में अपने काम के लिए अंतरराष्ट्रीय ख्याति बटोरी। रिचर्ड एटनबर्ग की फिल्म 'गांधी’ में छोटी-सी लेकिन काफी असरदार भूमिका निभाने के बाद हॉलीवुड और यूरोपियन फिल्मों में उनका कद काफी बढ़ गया। आगे चलकर हॉलीवुड और ब्रिटिश फिल्म इंडस्ट्री के कई नामी-गिरामी अभिनेताओं और निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया। माइक निकोलस और जैक निकोल्सन के साथ वह हॉलीवुड फिल्मों में नजर आए। 2007 में आई फिल्म 'चार्ली विल्सन वॉर’ में टॉम हैक्स और जुलिया रोबर्ट्स के साथ उन्होंने राष्ट्रपति जिया-उल-हक का किरदार निभाया। 'ईस्ट इज ईस्ट’ और उसके सिक्वल 'वेस्ट इज वेस्ट’ फिल्म में ओम पुरी लिंडा बेसेंट के साथ पर्दे पर नजर आए। फेमस हॉलीवुड एक्टर पैट्रिक स्वेज के साथ 'सिटी ऑफ ज्वॉय’ में उन्हें देखा गया। 'गाज़ी अटैक’, 'ए डेथ इन ए गूंज’, और 'वायसराय हाऊस’ जैसी कई फिल्में रिलीज होने के इंतजार में हैं।



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