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बुधवार, 23 मई 2018

काबायान का शिकार

(इंडोनेशिया में अपने से बड़े पुरुष को आदर के साथ पा और महिला को इबू कह कर संबोधित किया जाता है। कुछ संबोधन-पा=पिता तुल्य, इबू=मां के समान, ओम= चाचा, मोस = भाई, बा= बहिन)

बहुत दिनों से काबायान और उसके ससुर हिरन का शिकार करनेकी सोच रहे थे। आखिर एक दोपहर काबायान ने अपने ससुर को आवाज दी-'पा, चलिए, आज हिरन के शिकार पर चलें। हम दोनों मिलकर गड्ढा खोदेंगे, मुझे उम्मीद है कि रात में उसमें हिरन जरूर फंस जाएगा। फिर हम उसे आधा-आधा बांट लेंगे।ï’

'नहीं, तुम्हें अकेले गड्ढïा खोदना, मैं तो चिडिय़ों के लिए जाल डालूंगा,’ काबायान के ससुर ने उत्तर दिया।

'ठीक है, लेकिन याद रखिए कि अगर हिरन फंसा तो मैं उसकी एक बोटी भी नहीं दूंगा,’

काबायान बोला।

'हां, हां, ठीक है, मत देना। अगर चिडिय़ां फंसी तो मैं भी तुम्हें एक चिडिय़ां तक नहीं दूंगा,’

ससुर ने भी उसी सुर में जवाब दिया।

दोनों साथ-साथ जंगल गए। ससुर ने चिडिय़ों के लिए जाल बिछाया और उससे थोड़ी ही दूरी पर काबायान ने हिरन के लिए गड्ढïा खोदा। लौटते समय उन दोनों ने तय किया कि सुबह अपने-अपने शिकारकी खबर लेने दोनों साथ वापस आएंगे।

अगले दिन बहुत सबेरे काबायान के ससुर, जो एक लालची और छोटे दिल के व्यक्ति थे, अकेले ही जंगल चले गए। उन्होंने देखा कि चिडिय़ों का जाल तो खाली पड़ा है अलबत्ता काबायान के गड्ढïे में हिरन फंस गया है। उसने जल्दी से हिरन को वहां से निकाला और उसे अपने चिडिय़ों वाले जाल में फंसा कर झटपट घर लौट गए।

घर पहुंच कर उन्होंने ऊंचे स्वर में पुकारा 'काबायान! ओ काबायान! क्या तुम अभी तक सो रहे हो? उठो, चलो हम अपने शिकार देखने चलें।’

काबायान उस समय सुबह की मीठी नींद के खुमार में था। ससुर की आवाज सुन कर वह झट से उठ बैठा। मुंह पर ठंडे पानी के छींटे मार कर वह उनके साथ निकल पड़ा।

जंगल में पहुंचे तो अपने जाल की ओर देख कर काबायान के ससुर ने विस्मय से कहा, 'ओ! देखो तो! ये मैं क्या देख रहा हूं? मेरे जाल में हिरन फंसा है। कहीं ये सपना तो नहीं? चलो-चलो काबायान तुम्हारे गड्ढïे में भी चल कर देखते हैं। जाने वहां क्या मिले? काबायान का गड्ढïा खाली पड़ा था। उसने कुछ नहीं कहा लेकिन वह ससुर के साथ घर भी नहीं लौटा।

काबायन की पत्नी और सास नाश्ते के लिए बड़ी देर तक उसके  लौटने की राह देखती रहीं। अंत में काबायानकी पत्नी रो पड़ी 'अब तक घर नहीं लौटा, कहीं उसे शेर तो नहीं खा गया।’

'रोओ मत, रोओ मत, मैं उसे खोजने जाता हूं, कह कर काबायान के ससुर फिर जंगल की ओर चल पड़े।’

नदी किनारे उन्हें घुटनों पर सिर टिकाए बैठा काबायान दिखाई दिया। पास जाकर जरा गुस्से में उससे कहा, 'इतने घंटों से यहां बैठे क्या कर रहे हो? वहां मेरी बेटी चिंता के मारे रो-रोकर अपनी जान दिए जा रही है।’

'मैं अनोखी चीज देख रहा हूं,’ काबायान ने नदी पर से नज़रें हटाए बगैर कहा।

'क्या?’ ससुर ने उतावला होते हुए पूछा।

'देखो, नदी का पानी ऊपर की ओर बह रहा है, उल्टा उद्गम की ओर।’

'पागल हो गए हो क्या? भला ऐसा भी कभी होता है?’ ससुर ने झुंझला कर कहा।

'क्यों? जब हिरन चिडिय़ों के जाल में फंस सकता है तो नदी अपने उद्गम की ओर क्यों नहीं बह सकती,’ काबायान ने किंचित रूखेपन से कहा।

ससुर को समझ में सारी बात आ गई। उन्होंने काबायान को उसका हिरन क्षमा याचना सहित लौटा दिया। उस रात सारे परिवार ने हिरन के मांस का आनंद लिया।

दूसरेकी वस्तु पर अपना अधिकार जताना अन्याय है।



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