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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

जेल में गौरैया का बसेरा

तिहाड़ जेल के हेड वॉर्डर योगेंद्र कुमार ने जेल में बसाया गौरैया का नया संसार

माना जाता है कि, गौरैया अब दिल्ली से बिल्कुल गायब हो चुकी है लेकिन यह पूरा सच नहीं है। दिल्ली से जब धीरे-धीरे गौरैया के आशियाने उजड़े तो फड़फड़ाते पंखों को नया ठिकाना जेल में मिला। दिल्ली की राजपक्षी गौरैया कहीं दूर नहीं गई, बल्कि दिल्ली में ही मंडोली जेल में रहती हैं। इनके उजड़े घोंसलों को फिर से तिहाड़ जेल के हेड वॉर्डर योगेंद्र कुमार ने बसाया। नतीजतन अब हजारों गौरैया जेल में बेफिक्र दाना चुग रही हैं। 
1971 से योगेंद्र ख्याला के रघुवीर नगर में रह रहे योगेंद्र के परिवार में पत्नी सुनीता व बेटा- बेटी हैं। 1996 में जेल वॉर्डर भर्ती हुए। अब तिहाड़ जेल में हेड वॉर्डर हैं। परिंदों से योगेंद्र का रिश्ता ऐसे ही नहीं बना, एक जख्मी चिड़िया ने इनके मन को विचलित कर दिया था। योगेंद्र बताते हैं कि  किस्सा साल 2006 का है जब तिहाड़ जेल के सीलिंग फैन से टकराकर एक चिड़िया बुरी तरह जख्मी हो गई। एक वार्डर उस जख्मी चिड़िया को ऑफिसर के पास लेकर आया। तब योगेंद्र की उस अफसर के दफ्तर में ड्यूटी थी। योगेंद्र देख रहे थे। 
अफसर ने उस वार्डर से कहा कि इसे अस्पताल ले जाओ, लेकिन वह लड़का राजा गार्डन के उस अस्पताल से अनजान था। योगेंद्र टकटकी लगाए देखते रहे मगर कुछ बोल न सके। वह वार्डर जख्मी परिंदे को ले गया। उस रात मन उन्हें कचोटता रहा, क्योंकि योगेंद्र के घर के पास ही राजा गार्डन स्थित ऐनिमल एंड बर्ड्स केयर अस्पताल है। तब से योगेंद्र ने पूरी जिदंगी परिंदों के लिए लगा दी। अपने वेतन से हर महीने 10 प्रतिशत रकम वे परिंदों पर खर्च करते हैं। 
योगेंद्र ने बताया, शुरू से तिहाड़ जेल तैनात रहे हैं। मगर मंडोली जेल के शुरू होने पर साल 2016 में आठ महीने यहां तैनाती रही। तभी एक दिन गायब गौरैया नजर आईं। पहले तो गौरैया आने से डरीं। मगर दाना-पानी का जुगाड़ किया। दुकानों पर जा-जाकर पैकिंग वाले खाली गत्ते के डिब्बे इकठ्ठे किए। उन्हें घोंसलों की शक्ल देकर जेल परिसर के सुरक्षित जगहों पर फिट किया। दो चार दिन में ही गौरैया तिनके जोड़ते ही उन डिब्बों में घोंसले तैयार करने शुरू कर दिए। आज मंडोली जेल में करीब 70 डिब्बों में गौरैया के घोंसले हैं। गौरैया की देखभाल, उनके रखरखाव की इस मुहिम में योगेंद्र के साथ जेल प्रशासन व कैदी इस कदर जुड़े कि जेल नंबर 14 में बची हुई लकड़ियों को जोड़कर घोंसले बनाकर तैयार कर दिए। योगेंद्र की मुहिम को सराहा डेप्युटी सुपरिंटेंडेंट राजेंद्र कुमार ने। अब उनकी देखरेख में जेल प्रशासन व कैदी हजारों गौरैया का खूब ख्याल रखते हैं। 
पिछले साल 20 मार्च को गौरैया दिवस पर मंडोली जेल नंबर 13 में पहली बार बड़ा आयोजन किया गया। यह आयोजन मील का पत्थर साबित हुआ। सभी कैदी, जेल प्रशासन जुड़ गए। इसी साल 20 मार्च को तिहाड़ जेल के डीआईजी ने सर्कुलर जारी किया। सभी 16 जेलों में गौरैया दिवस मनाया गया। तिहाड़ जेल के डीआईजी एसएस परिहार ने कराया था। खुद योगेंद्र पांच साल में 37 स्कूलों में जाकर गौरैया के प्रति जागरुकता और कंप्टीशन करा चुके हैं। 
स्कूलों की तरफ से 50 से ज्यादा सर्टिफिकेट मिले हैं। कई पुरस्कार मिले हैं। योगेंद्र की मानें तो बीते कुछ सालों से ऊंची और फैलती इमारतों के दायरे, शहरीकरण, रहन-सहन में बदलाव, मोबाइल टावरों से निकलते रेडिएशन, कम हरियाली की वजहों से गौरैया की संख्या कम होती जा रही है। योगेंद्र बताते हैं, मंडोली जेल की तैनात के समय कोई गौरैया जख्मी हो जाए तो उसे डिब्बे में पैक करके वाया मेट्रो राजा गार्डन स्थित ऐनिमल केयर ऐंड बर्ड्स केयर सेंटर में भर्ती कराते थे। योगेंद्र ने अपने तौर पर तिहाड़ जेल में भी चिड़ियों की बाकी प्रजातियों को सरंक्षण किया हुआ है। अब तक अस्पताल में जख्मी परिंदों को 500 से अधिक बार ऐडमिट करा चुके हैं। घर में अलग से एक कमरा भी बनाया हुआ है। 
इसी 15 अगस्त के दिन चाइनीज मांझे से घायल चार चिड़ियों को बचाया था। घर लाकर इलाज किया। सुबह ठीक होने पर उन्हें आसमान में आजाद कर दिया। योगेंद्र ने दवाईयां घर में रखी हुई हैं। इस काम में पत्नी और बच्चे भी भरपूर सहयोग देते हैं। योगेंद्र का इस साल पदमश्री अवॉर्ड के लिए ऑन लाइन नाम भेजा गया है।



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