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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

दुर्गा दत्त - दुखों से लड़ना है, तो भक्तिभाव चाहिए

दर्द के साए में बीतती जिंदगी तब और उदास और बेजान हो जाती है, जब कोई अपना इस दुनिया में रहते हुए भी आपके पास न हो

शायर और कवि अक्सर लोगों की जिंदगी का दर्द शब्दों में उतार देते हैं। मकबूल शायर शकील बदायूंनी का एक मशहूर शेर है- अब तो खुशी का गम है न गम की खुशी मुझे, बे-हिस बना चुकी है बहुत जिंदगी मुझे। शकील बदायूंनी का ये शेर, शायद पश्चिमी बंगाल की राजधानी कोलकाता की रहने वाली दुर्गा दत्त के लिए ही लिखा गया था। उनकी भी जिंदगी दर्द के इसी समंदर में डूबी रही।
लेकिन दुर्गा दत्त की जिंदगी हमेशा से ऐसी नहीं थी। कम उम्र में शादी होने के बाद दुर्गा दत्त एक खूबसूरत जिंदगी के ख्वाब संजो रही थीं। नाजुक उम्र के मोड़ पर, उसे परिपक्व होने के लिए वक्त चाहिए था। अगर रिवाजों की आंधियां हर समय में रही, तो हसीन और खुशनुमा ख्वाब देखने 
की आजादी भी मन में हमेशा रही है। दुर्गा भी इन्हीं सपनों के सहारे अपना आशियाना बनाने में जुटी थीं।
समय के साथ उसने एक लड़के को जन्म दिया और उसकी परवरिश में अपना तन-मन-धन सबकुछ न्योछावर कर दिया। उसके पति की कपड़े की दुकान थी, इसीलिए पति दिनभर काम संभालते थे और वह घर पर बच्चे का भविष्य संवारने की कोशिश करती रही। लेकिन दुर्गा को भी अब दर्द के भीषण सैलाब से गुजरना था, उसे उस मंजर को देखना था, जिसकी उसने शायद कभी कल्पना भी न की हो।
दुर्गा का लड़का 27 साल का हो चुका था। लेकिन एक दिन अचानक उसे ब्रेन स्ट्रोक हुआ और उसकी जिंदगी खत्म हो गई। अपने जवान बेटे को खोकर, दुर्गा की तो जैसे सांस ही रुक गई हो। वह बुत सी बन गई, उसे लगा कि जैसे कोई तूफान आया और एक पल में जिंदगी की सारी कमाई तहस-नहस करके चला गया।
इससे पहले कि वह इस सदमे से उबर पाती, जवान बेटे की मौत, बाप बर्दाश्त न कर सका और बेसुध हो गया। फिर एक दिन इस सदमे के साथ उसका पति हमेशा के लिए कहीं चला गया और कभी लौटकर नहीं आया।
दुर्गा कहती हैं कि मैं 2.5 वर्ष की थी, जब मेरे पिता गुजर गए। एक बहन थी वह भी गुजर गई। लेकिन फिर भी शादी के बाद मैं हमेशा खुश रहती थी और बेहतर जीवन जीने के बारे में सोचती रहती थी। सबकुछ ठीक था, लेकिन तभी अचानक मेरा लाडला बेटा मुझे छोड़कर चला गया। मैं इस सदमे से बाहर आ पाती कि मेरे पति भी खो गए, मैंने बहुत कोशिश की उन्हें ढूंढने की, लेकिन वो नहीं मिले। आखिरकार मेरी तलाश ठहर गई और मुझे अहसास हो चला कि वो शायद अब इस दुनिया में नहीं हैं। अब वैधव्य का जीवन मेरे हिस्से में आ पड़ा था, मुझे इसी सफेद रंग के साथ जिंदगी बितानी थी।
दुर्गा भी ठहरे हुए दर्द की तरह जी रही थीं, लेकिन एक दिन किसी के कहने पर राधा-कृष्ण की नगरी वृंदावन की ओर उनके कदम बढ़ गए। करीब 22 साल पहले वह वृंदावन की मिट्टी को अपना जीवन समर्पित करने के लिए आ गईं।
वृंदावन आकर उन्होंने पगला बाबा आश्रम में 7 साल गुजारे, फिर गुरुकुल आश्रम में रहने लगीं। दुर्गा ने वृंदावन में कई ठिकाने बदले, लेकिन कान्हा के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती चली गई। वह मीरा बाई आश्रम में भजन करने लगीं। इन सबके बीच, वृंदावन में ही उन्हें दर्द के बहते सागर में ठहराव मिला, कान्हा की भक्ति ने उन्हें शांति और संतुष्टि दी। अब वह सुलभ इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन द्वारा सहायता प्राप्त एक आश्रम में रहती हैं और जिंदगी के असली मायने तलाश कर रही हैं।
दुर्गा कहती हैं कि मुझे 22 साल हो गए वृंदावन में, पहले बहुत परेशानियां आईं, लेकिन कान्हा ने हर मुश्किल से निकाल लिया। अब मैं लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) की शरण में हूं। मेरे लिए हर सहायता उपलब्ध है और मुझे कोई परेशानी नहीं है।
दुर्गा अपने चेहरे पर एक भावपूर्ण संतुष्टि की मुस्कान के साथ कहती हैं, बेइन्तहां दर्द के बीच मैंने अपनी अधिकतर जिंदगी बिताई है, लेकिन इस शहर की माटी ने मुझे आखिरकार सार्थक जीवन दिया है।



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