sulabh swatchh bharat

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

उषा खन्ना - शालीन संगीत की ‘उषा’

हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में जद्दनबाई और सरस्वती देवी की परंपरा में उषा खन्ना एक बिल्कुल अलग ही धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं। उनके खाते में ऐसे दर्जनों लोकप्रिय धुनें हैं, जिन्हें लोग आज भी सुनते और गुनगुनाते हैं

उषा खन्ना हिंदी फिल्म संगीत के बड़े पुरुष प्रधान समाज में ऐसी महत्वपूर्ण महिला संगीतकार के रूप में मौजूद रहीं, जिन्होंने लोकप्रियता के शिखर पर जाकर अपने लिए एक नया और पुख्ता मुकाम बनाया। दरअसल, जद्दनबाई और सरस्वती देवी की परंपरा में उषा खन्ना एक बिल्कुल अलग ही धरातल पर खड़ी दिखाई देती हैं। उनके खाते में दर्जनों ऐसी सुपरहिट फिल्में हैं, जिनसे हम उषा खन्ना को लेकर एक अलग ही किस्म का सांगीतिक विमर्श रच सकते हैं। 

धुनों में नाजुक अहसास
पहली ही फिल्म ‘दिल दे के देखो’ (1959) से कामयाबी के झंडे गाड़ने वाली उषा ने बाद में अपनी प्रतिभा से कुछ बेहतरीन फिल्मों का संगीत रचा, जिनमें याद रह जाने वाली फिल्में हैं- ‘शबनम’, ‘हम हिंदुस्तानी’, ‘आओ प्यार करें’, ‘एक संपेरा एक लुटेरा’, ‘निशान’, ‘एक रात’ और ‘सौतन’।
उषा खन्ना के संगीत का सबसे सार्थक पहलू यह है कि उसे आप अनुशासित तरीके से बेहद परिष्कृत संगीत के रूप में देख सकते हैं। धुनों में नाजुक रेशमी अहसास को बेहद सहजता से विकसित करने का कौशल उनकी सबसे बड़ी खासियत के रूप में प्रसिद्ध है। यदि हम उषा खन्ना के पूरे करियर में से कुछ गीतों के आधार पर उनकी शिनाख्त करना चाहें, तो कह सकते हैं कि वह किसी भी तरह की अतिरंजना से दूर आधुनिक अर्थों में बेहद परिष्कृत, मुलायम और शालीन किस्म का संगीत है, जिस पर उत्साह की छाया तो पड़ती है, मगर उसमें अतिरिक्त जोश भरी अतिरंजना से दूरी बरती गई है। उदाहरण के तौर पर उनके द्वारा कंपोज और लता मंगेशकर के द्वारा गाए हुए ‘आओ प्यार करें’ का गीत ‘एक सुनहरी शाम थी’ को सुनें या लता जी का ही ‘हम हिंदुस्तानी’ के लिए ‘मांझी मेरी किस्मत के जी चाहे जहां ले चल’ पर गौर करें या फिर ‘शबनम’ के लिए मोहम्मद रफी की आवाज में बेहद खूबसूरत ‘मैंने रखा है मोहब्बत तेरे अफसाने का नाम’ जैसा गीत, धुनों में शालीनता उभरकर सामने आ खड़ी होती है।

पुरुष वर्चस्व को चुनौती
उषा खन्ना के लिए एक चुनौतीपूर्ण बात यह रही कि पुरुषों के वर्चस्व वाले हिंदी फिल्मी संगीत के समाज में उन्हें बड़े बैनरों की फिल्में बेहद कम मिलीं। बावजूद इसके उन्होंने तमाम सारे साधारण बैनरों की फिल्मों के लिए अविस्मरणीय संगीत रचा। ‘शबनम’, ‘निशान' और ‘एक संपेरा एक लुटेरा’ जैसी फिल्में इसी बात के उदाहरण हैं। इनमें कुछ और फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं, जिनके कुछ गीतों ने कमाल की लोकप्रियता हासिल की थी। ‘मुनीम जी’, ‘दादा’, ‘हवस, ‘मेरा नाम जौहर’, ‘मैं वही हूं’, ‘फैसला’ और ‘स्वीकार किया मैनें’ जैसी फिल्में उसी परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
उषा खन्ना एक हरफनमौला संगीतकार के रूप में भी प्रभावित करती हैं, जब वे बाउल शैली में ‘चोरी-चोरी तोरी आई है राधा’ (हम हिंदुस्तानी), अरबी शैली के दिलकश अंदाज में 'हसनुल अली हबा' (शबनम), कव्वाली की ठेठ पारंपरिक बहार लिए हुए ‘रात अभी बाकी है, बात अभी बाकी है’ (दो खिलाड़ी) और नए अंदाज में रूमानियत की खुशबू लिए ‘साजन बिना सुहागन’ का गीत ‘मधुबन खुशबू देता है’ जैसी बेहतरीन धुनें बनाती हैं।

ओपी नैयर की छाया
यह हमेशा ही विमर्श का विषय रहेगा कि अपने समकालीनों के साथ कदम से कदम मिलाते हुए इतनी कल्पनाशील धुनों को रचकर भी वे संगीतकार के बतर्ज वह मुकाम क्यों नहीं बना सकीं, जो उनके समानांतर उस दौर में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी, आरडी बर्मन और यहां तक कि अस्सी के दशक में बप्पी लाहिड़ी को हासिल था।
उनकी शैली में इंटरल्यूड और प्रील्यूड में पियानो और वॉयलिन के साथ हल्की-फुल्की संवाद जैसी लड़ंत, शालीन किस्म का ऑर्केस्ट्रेशन रचने और अंतरों में बहुत गरिमा के साथ बोल उठाने की तरकीब कमाल की है। इसी के बीच अक्सर तेज गति का वॉयलिन टुकड़ों-टुकड़ों में इतने सुंदर ढंग से आकार लेता है कि वह पूरी धुन को एक नए ढंग का तर्जे-बयां देता है। यह आधुनिक किस्म का संगीत उन्होंने कुछ-कुछ उसी परिपाटी के तहत विकसित किया है, जिस तरह उनकी पहली संगीतबद्ध फिल्म के संगीत पर ओपी नैयर की छाया पड़ती दिखाई देती है।

सांगीतिक उत्कर्ष
‘बड़े हैं दिल के काले’ (दिल दे के देखो) जैसा गीत उषा खन्ना ही रच सकती थीं। उन्होंने सुगम संगीत बाकायदा रॉबिन बनर्जी जैसे संगीतकार से सीखा हुआ था। बाद में जब उन्होंने अपना खुद का मुहावरा विकसित कर लिया तब एक गंभीर शैली की चेतना से सजी हुई धुनों ने उषा खन्ना का सांगीतिक उत्कर्ष रचा। फिर एक लंबी सूची है, जिनमें इस तरह के दर्जनों गीतों को याद किया जा सकता है।
उनके तुरंत याद आने वाले स्तरीय गीत हैं- ‘ऐ शाम की हवाओं उनसे सलाम कहना’ (एक रात), ‘बरखा रानी जम के बरसो’ (सबक), ‘पानी में जले मेरा गोरा बदन’ (मुनीम जी), ‘हम तुमसे जुदा हो के मर जाएंगे रो रोके’ (एक संपेरा, एक लुटेरा), ‘तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है’ (आप तो ऐसे न थे) और ‘जिंदगी प्यार का गीत है’ (सौतन)।

कमाल का आर्केस्ट्रेशन
इस तरह हम यह कह सकते है कि एक लंबे संगीत सफर में उषा खन्ना ने अतिरंजना से बचते हुए ढेरों लोकप्रिय धुनें बनाईं, जिनसे आधुनिक किस्म का संगीत पैदा हुआ। उन्होंने अपनी धुनों को बेहद संतुलित ढंग से विकसित करते हुए भावनाओं के कोमलतम स्तर पर जाकर गीतों को चमकदार और सुंदर बनाया है। आर्केस्ट्रेशन का काम अलग से उनकी समकालीनता को एक खास ढंग से चिन्हित करता है। एक हद तक उनका संगीत अतिरेकी नहीं, बल्कि धीरज और विवेक का संगीत है, जिनमें एक स्त्री की कोमलता चुपचाप गुंथी हुई है।



Bringing smiles to every face hindi ad copy %281%29

ऑडियो