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मंगलवार, 25 जून 2019

मिशन बने गंगा को बचाने का विजन

स्वामी अवधेशानंद गिरि जी के साथ हुई लंबी बातचीत का संपादित अंश

स्वामी अवधेशानंद गिरि से बात करना जहां एक तरफ ज्ञान की अतल गहराइयों में उतरने का सहज अनुभव है, वहीं उनसे बात करते हुए हम स्वयं को, अपने समय की चिंताओं और चुनौतियों के बारे में आंतरिक रूप से जागरुक होते हैं। मसलन, पर्यावरण को लेकर स्वामी जी समझाते हुए कहते हैं, ‘पर्यावरण का अर्थ है, जिससे जैव संतुलन रहता है। जैव जगत में जो कुछ भी है, धरती, अंबर, जल, अग्नि, वायु, नक्षत्र, विविध प्राणी... इन सबका संबंध पर्यावरण से है। आज ग्लोबल वार्मिंग, उच्च तापमान के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं। जिस तरह से हरीतिमा का हनन हुआ है, न केवल वन, अपितु वन्य संपदा भी जिस तरह से छीन ली गई है। जिस ढंग से सलिलाओं का सातत्य, नदियों का प्रवाह बाधित हुआ है, उनकी अविरलता, निर्मलता, शुचिता, सातत्य, स्वभाव, सबका हनन हुआ है। उसे देखकर कहा जा सकता है कि जीवन अब उतना सुगम और सहज नहीं रहा। अंबर और अंतरिक्ष में अब असहजता है। धरती पर तो पर्यावरण के असंतुलन को सीधे देखा जा सकता है।’ 
स्वामी जी के साथ सत्संग के साथ जो बड़ी बात है, वह यह कि वे सिर्फ चिंता या चुनौतियों की बात नहीं करते बल्कि वे इसके समाधान को लेकर भी चर्चा करते हैं। पर्यावरण को ही लें तो वे इसके असंतुलन से आगे उन बातों और प्रयासों पर भी जोर देते हैं, जिससे जीवन और प्रकृति के बीच विसंगति न बढ़े। वे कहते हैं, ‘पर्यावरण के लिए, हमने बहुत पहले वृक्ष को चुना। अगर धरती पर वृक्ष है तो प्राण है, आद्रता है, जलवायु है, औषधि है, उसके पल्लव-पात, छत्रछाया, हरीतिमा, गंध-सुगंध, मकरंद, प्राण-वायु सब हमारे जीवन के लिए हैं। उससे पैदा होने वाली आद्रता बादलों को आमंत्रित करती है। उसकी जड़ें भूस्खलन को रोकती हैं, अथवा जल का संतुलन बनाती हैं। ये बात पूरे देश में कही गईं और अभी हाल में ही मध्य प्रदेश सरकार ने 25 करोड़ पेड़ लगाए हैं। उत्तर प्रदेश सरकार भी पेड़ लगा रही है। अन्य राज्य सरकारें भी इस बात पर सचेत हुई हैं। हमारा पर्यावरण को लेकर प्रकल्प बहुत पुराना है। हमने गांव-गांव, हर शहर और अनगिनत स्थानों पर लोगों को वृक्षारोपण के लिए प्रेरित किया है। हमने कहा कि तुलसी घर-घर पहुंचनी चाहिए, पेड़ों में भी नीम, पीपल, कदंब, पाकर लगने चाहिए क्योंकि ऐसे पेड़ों में नित्य प्राण वायु है।’ 
स्वामी अवधेशानंद गिरि अनेक सेवा और कल्याण कार्यों से जुड़े हैं, उसमें जल को लेकर चिंता सर्वोपरि है। उनके ही शब्दों में, ‘हम लोगों ने वर्ष 2004 में पहली बार उज्जैन में जल पर एक चर्चा की। हालांकि इसके लिए जो शब्द दिया गया, मैं उसके पक्ष में नहीं था, लेकिन जल पुरुष राजेंद्र सिंह और प्रोफेसर राम राजेश मिश्र और डॉ. चौहान जैसे बड़े पर्यावरणविदों ने कार्यक्रम को नाम दिया ‘जल संसद’। पूरे देश से लगभग 250 जल वैज्ञानिकों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया। फिर वर्ष 2005 में हमने इंदौर में भी जल को लेकर चर्चा की। वर्ष 2007 में प्रयाग के कुंभ में ‘जल संसद’ हुई, 2010 में हरिद्वार के कुंभ में, 2013 में फिर से प्रयाग के कुंभ में और 2016 में उज्जैन में ‘जल संसद’ आयोजित की गई। आईआईटी से लेकर कई बड़े संस्थानों के वैज्ञानिकों ने अपने शोध पत्र पढ़े, अपने अनुभवों को साझा किया। इन सबसे जो बात निकलकर आई, वह यह थी कि धरती पर 1 फीसदी से भी कम पीने योग्य जल बचा है। इसीलिए तत्काल नदियों को बचाना, जलस्तर को बढ़ाने के लिए पेड़ लगाना बहुत ही जरूरी है। पहली आवश्यकता यह है कि नदियों की अविरलता, निर्मलता को सहेज कर रखा जाए।’ 
अपनी इन्हीं बातों और पहल की चर्चा करते हुए वे आगे कहते हैं, ‘वर्ष 2001 में जब अटल जी की सरकार थी, तब टिहरी बांध को रोकने के निमित्त एक गंगा यात्रा निकाली गई। मैं उस ‘गंगा रक्षा यात्रा’ का अध्यक्ष था। 5000 साधु-संत हरिद्वार से दिल्ली गए। जगह-जगह पर हम लोगों ने जल सभाएं की। उस वक्त माननीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी से बात हुई और कई वैज्ञानिकों ने चिंता व्यक्त की कि हमने अपनी नदियों की घोर उपेक्षा की है, हम अपनी नदियों के प्रति उदासीन रहे हैं। आज यमुना की स्थिति आप देख सकते हैं कि दिल्ली के बाहर उसमें जल नहीं है, 99 फीसदी से ज्यादा पानी सीवर का है। यही स्थिति गंगा की भी है।’ इन्हीं कुछ बातों को लेकर जब उनसे कुछ प्रश्न किए तो उसके उत्तर उन्होंने काफी स्पष्टता के साथ दिए।  

गंगा के बारे अभी एक रिपोर्ट आई है कि 2060 तक गंगा में पानी नहीं रहेगा।  इस बारे में आप क्या कहेंगे?
आज भी गंगा में पानी नहीं है। आज भी कुछ क्यूसेक पानी के लिए हरिद्वार के लोग तरसते रहते हैं कि हमारे सामाजिक सरोकार, पूजा-पाठ के लिए पानी मिल जाए। आने वाले कुंभ के लिए जो पानी चाहिए, उसके लिए अभी से रणनीति बन रही है। इसके लिए हमने कई संगोष्ठियां की हैं, वृक्षारोपण के कार्यक्रम किए हैं, अनेक जागरुकता कार्यक्रम चलाए हैं, हमने विधिवत कई जल संसद आयोजित की हैं। लेकिन हमारी जल संसद नारों में, आंदोलनों में परिवर्तित नहीं हुई है, क्योंकि मैं संन्यासी हूं, एक्टिविस्ट नहीं हूं। मैं वैचारिक आंदोलन का पक्षधर हूं। मैं चाहता हूं कि लोगों की मानसिकता बदले। लोग यह बात समझें कि हमारा परमात्मा नीर से ही पैदा हुआ है, इसीलिए इसे बचाना जरूरी है। परमात्मा की उत्पति नीर से है, सारे रत्न समुद्र ने दिए हैं, इसीलिए हमने जल को बचाने के लिए कहा है।
पर्यावरण पर मेरा यही कहना है कि इस देश के जल को बचाया जाए, जल को बचाने का एक ही जरिया है कि पेड़ लगाए जाएं, नदियों के किनारों को खोदा जाए, सीवर के पानी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाए। गंगा-यमुना के साथ इस देश की अनेक नदियां को बचाने की जरूरत है। लोग यह बात सुनकर चकित होंगे कि चंबल का पानी प्रयाग में पहुंच रहा है, यमुना का जल तो पहुंच ही नहीं रहा है। आप सोचिए, कितनी उदासीनता है।

इतनी संगोष्ठियां होती हैं, सेमिनार होते हैं, वैज्ञानिक अपने तर्कों और शोधों पर बात करते हैं, उपाय सुझाते हैं, लेकिन यह सब धरातल पर नहीं उतर पाता है, आपके क्या विचार हैं कि कैसे इनका कार्यान्वयन किया जाए?
समाज में प्रच्छन्न उपभोगवाद है। स्वार्थ चरम पर है, अपने हितों की रक्षा के लिए लोगों का जीवन समर्पित हो गया है। हमें कुछ और दिखता ही नहीं। जब आपको सिर्फ अपना घर दिखे और मोहल्ले की गली न दिखे। आप गली में कूड़ा फेंक दें, आप सड़क पर लगे हुए बल्ब को निकालकर ले जाएं, नए बने हुए पुल के लोहे को निकालकर ले जाएं तो सोचिए समाज किधर जा रहा है। हमें आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। अभी हम जिस दिशा में जा रहे हैं, वह राह मानव जाति की समाप्ति की और ले जाती है। हम इस धरती की हत्या की और बढ़ रहे हैं, हमारी जो प्रवृतियां हैं, वे सब आत्मघाती हैं। हमें कुछ दिख ही नहीं रहा है, न हम इस धरा के लिए सोचते हैं न इस जलवायु के लिए। यहां तक कि हम अपने स्वास्थ्य के लिए भी चिंतित नहीं हैं। हम इतनी गहरी तंद्रा में हैं कि तत्काल कुछ पदार्थों के आकर्षण में उलझे हुए हैं।

आपके अनुसार गंगा कब तक अविरल और स्वच्छ हो जाएगी?
मुझे लगता है कि गंगा के लिए जो गंभीर प्रयासों का सिलसिला पहले होना चाहिए था, वो अब दिखाई दे रहा है। अब उसके कितने परिणाम आएंगे, यह अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन प्रयास कुछ मिशन जैसा बने, यह अब भी नहीं दिख रहा है। विजन तो है लेकिन यह एक मिशन में बदले, यह नहीं लग रहा। 

एक रिपोर्ट के अनुसार नदियों में गिरते सीवर पहले से बढ़ गए हैं। कहीं न कहीं सरकारी तंत्र की कमी तो साफ दिखती है?
मैं 1830 का उदहारण देता हूं, जब दिल्ली में पहली बार फ्लश सिस्टम आया। उससे पहले दिल्लीवासियों ने कभी यमुना का पानी पीने के लिए नहीं लिया। दिल्ली में बावड़ियां थीं, वहीं से पीने का पानी आता था। फ्लश सिस्टम के बाद यमुना के जल का दोहन शुरू हो गया। पहले लोग सिर्फ तर्पण और आचमन के लिए नदियों के जल का प्रयोग करते थे। लेकिन अब उससे सिंचाई भी हो रही है और अब उसे फ्लशिंग सिस्टम में भी उपयोग किया जाता है। सोचिए जरा कि पीने के पानी का उपयोग फ्लशिंग में हो रहा है, सड़के धोईं जा रही हैं, कपड़े धोए जा रहे हैं। नतीजतन अब यमुना में जल ही नहीं है।

अटल जी ने कहा था कि नदियों को जोड़ा जाए। आपके अनुसार हर नदी का स्वभाव अलग होता है। ...तो क्या उनको जोड़कर आपदाएं रोकी जा सकती हैं। आपका इस पर क्या कहना है?
हमने बहुत से देश देखें हैं जहां नदियों के जल को रोका जाता है, उसके अनेक उपाय हैं। बिजली बनाने के लिए भी हाइड्रोलिक सिस्टम के तहत अनेक उपाय हैं। बांधों की भी इतनी आवश्यकता नहीं है। यह सब हम जानते हैं, लेकिन वो कौन सी विवशताएं हैं जिस कारण हम इस बारे में निर्णय नहीं ले पाते हैं। यह सच है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हम खड़े नहीं हो पाए हैं। आर्थिक रूप से भले ही सबल हो रहे हों लेकिन नदियां कहां हैं, वन्य संपदा कहां हैं, खेत-खलिहान कहां हैं। 5 करोड़ जीवाश्म होते हैं एक ग्राम मिटटी में, अब 40 लाख बचे हैं। इतना दोहन हमने किया है। अगर फिर से गोबर की खाद डाली जाए, प्राकृतिक व्यवस्थाएं अपनाई जाएं, खेती सही से की जाए, तो हम फिर से धरती को उसके असली स्वरूप में ला सकते हैं।

इस दुर्दशा के लिए दोषी शहरीकरण है या बढ़ती हुई आबादी? 
देखिए, मुझे लगता है कि स्मार्ट सिटीज का कांसेप्ट अच्छा है, लेकिन हमें अपने गांवों को भी स्मार्ट बनाना होगा, सारी सुविधाएं देनी होंगी। इस दिशा में सरकार की कई बेहतर योजनाएं भी हैं। गांव की प्रतिभा को पलायन से रोकना होगा, वहां के संसाधनों को वहीं रोकना होगा, स्वरोजगार की व्यवस्था वहीं होनी चाहिए। छोटी-छोटी कॉटेज इंडस्ट्री वहीं लगानी होगी। अगर हर गांव में संभव न हो तो इसके लिए सहकारी व्यवस्था हो। यह पहले से हमारे देश में होता भी रहा है। अमूल किस तरह से हमारे देश में  दूध का आंदोलन बन गया, जिससे दूध के मामले में देश में आत्मनिर्भरता आई है। 

आज समाज में इतना तनाव देखा जा रहा है, मूल्यों में गिरावट आई है, लोग सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं। आपको इस देश में अध्यात्मिक शांतिवादी के रूप में देखा जाता है। आप आज की परिस्तिथियों पर क्या कहेंगे? 
बढ़ते तनाव के लिए मैं फिर से कहूंगा कि इसके लिए हमारा स्वार्थ जिम्मेदार है। हम दूसरे के स्वाभिमान, गौरव, उनकी निजता की चिंता नहीं रख पा रहे हैं। हम अपने संप्रदाय, जाति, कुल गोत्र, वंश, समुदाय को लेकर प्रचंड होते जा रहे हैं। हम भारतीय एक हैं, यह भावना तब संभव है जब व्यक्ति अध्यात्मिक बने। अध्यात्मिक प्राणी बहुत ही अनुशासित होता है। वो सबके हितों, सम्मान, स्वाभिमान की चिंता करता है। वह समतावादी मूल्यों में विश्वास रखता है। हमारी संस्कृति एकत्व की है, जो पूरे विश्व को परिवार मानती है। यह ज्ञान हमारी जीवन शैली, हमारे आचरण, चरित्र, प्रकृति और हमारे स्वभाव में उतरना चाहिए।

आध्यात्मिकता के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों को जोड़ने में आप कहां तक सफल रहे हैं?
हमने अपने कार्यों से जीवन में कुछ अच्छे परिणाम देखे हैं। लोग व्यसन मुक्त हुए हैं, प्रकृति प्रेमी बने हैं, लोगों ने विकारों से खुद को अलग रखा है, कुरीतियों से दूर हो रहे हैं, अर्थ का अपव्यय नहीं कर रहे हैं, परिवारों में एकता आई हैं, लोगों के अंदर देश प्रेम की भावना जगी है, परमार्थिक भाव भी जगे हैं। जब आप कुछ अच्छा संकल्प लेकर निकलते हैं, तो लोग प्रेरित होते हैं। इस तरह एक परिवर्तन भी आता है। यह सच है कि एक तरफ बढ़ता उपभोगवाद है, तो वहीं दूसरी तरफ अध्यात्म के लिए भी उत्सुकता है। जहां पदार्थों का आकर्षण और प्रलोभन लोगों के चित्त को झकझोर रहा है, वहीं दूसरी और कहीं आत्मा का सत्य भी उसे पुकार रहा है, वह अपने अस्तित्व को भी जानना चाहता है। इसके परिणाम देखिए कि योग के लिए एक विश्वव्यापी स्वीकृति बनी है। योग के कारण मैं एक बहुत ही सुखद भविष्य देख रहा हूं। अभी व्यक्ति योग से अपने शरीर को ठीक कर रहा है, एक दिन आएगा जब व्यक्ति योग से अपने मन को ठीक करेगा, मन की व्याधियों को ठीक करेगा। यह सुखद है कि भारत ने दुनिया को योग से प्रेरित किया है। जिस दिन भी योग देह से मन तक उतरेगा पूरा विश्व एक हो जाएगा। मैं इस विश्व को एक गांव, एक परिवार के रूप में देखना चाहता हूं।

स्वामी विवेकानंद की 125वीं जयंती पर आपको शिकागो आने का निमंत्रण मिला है। क्या संदेश लेकर जाएंगे आप?
मेरा भी वही पुराना संदेश होगा, जो विवेकानंद जी लेकर गए थे, संस्कृति और संस्कार का। यह विश्व एक कुटुंब है। एक संदेश यह भी रहेगा कि इतना अधिक धन हम युद्ध, उन्माद और सुरक्षा पर क्यों खर्च कर रहे हैं। यह धन मानव जाति के कल्याण पर क्यों नहीं खर्च किया जा रहा है। सामरिक नीतियों को छोड़कर यह धन शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च हो तो बेहतर है। भले ही वहां दोस्ती अस्त्र-शस्त्र को लेकर होती हो, लेकिन मैं अकेला नहीं हूं। मैं उन्हें जगाने की पूरी कोशिश करूंगा।



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