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मंगलवार, 25 जून 2019

पारुलबाला घोष - वृंदावन ने समझाया जीवन का मर्म

कुछ लोगों का जीवन सिर्फ दर्द को झेलने के लिए होता है, शायद पारुल उन्हीं में से एक हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में पति से लेकर बेटों तक, सबको खो दिया

दुष्यंत कुमार ने कभी लिखा था, ‘दुःख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें, सुख तो किसी कपूर की टिकिया सा उड़ गया।’ पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की रहने वाली पारुलबाला घोष की कहानी कुछ ऐसी ही है। उनकी जिंदगी में दुख ने कुछ इस तरह जगह बनाई कि जैसे उनकी नसों में खून नहीं, दुख बहता हो। लेकिन कान्हा और राधा की नगरी न सिर्फ उनके दुखों को भर रही है, बल्कि उन्हें सच्चे जीवन का मर्म भी समझा रही है।
पारुल 16 साल की थीं, जब उनकी शादी 20 साल की उम्र के एक व्यक्ति से हो गई। उसका पति एक कारखाने में काम करता था। उसकी आमदनी बहुत ज्यादा तो नहीं थी, लेकिन खुशहाल जीवन की नाव, इस सांसारिक सागर में आसानी से तैर सके, इतनी जरुर थी। दोनों पति-पत्नी मिलकर एक खूबसूरत जीवन के सपने संजोते हुए, आगे बढ़ रहे थे।
इस बीच पारुल ने 2 लड़कों और एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया। दोनों का पालन-पोषण बहुत बहुत प्यार से किया। जब बच्चे बड़े हो गए, तो उनकी शादी भी अपनी क्षमता के अनुसार धूम-धाम से की। 
लेकिन जिंदगी उतनी आसान कभी नहीं होती, जितनी दिखाई देती है। पारुल की जिंदगी में भी दुखों का वो पहाड़ आने वाला था, जिसके बोझ के तले वो शायद हमेशा के लिए दबने वाली थी। दुखों की वह श्रृंखला जो उसके हंसमुख जीवन को आत्मकेंद्रित और घुटन से भरा बनाने वाली थी।
एक दिन सुबह के वक्त अचानक ह्रदयाघात ने उसके पति की जिंदगी को छीन लिया। हमेशा हंसी का दामन थामे रहने वाली, पारुल के जीवन में एक पल में ही सब कुछ बदल गया। अब वैधव्य की सफेद चादर में, उसकी जिंदगी सिमट चुकी थी। उसे रंगों की चमक का परित्याग करना पड़ा। खुद को एक अधिकारविहीन प्रतिमूर्ति तक सीमित रखना था।
लेकिन जिंदगी सिर्फ इसी सितम तक रुकने वाली नहीं थी। अभी तो और बड़ा तूफान, उसकी नाव को जीवन के भवसागर में उफनती लहरों पर धकेलने वाला था। पारुल के छोटे बेटे जिसको शुगर की बीमारी थी, अचानक मौत हो गई। पारुल का जीवन जो पहले ही पति की मौत से बेजार हो चुका था, अपने बेटे की मौत से अत्यधिक विचलित हो गया। लेकिन इससे पहले कि इन दोनों दुखों को वह समेट पाती, उनके बड़े बेटे की भी स्ट्रोक से मौत हो गई। जीवन अब भीषण त्रासदी में बदल चुका था। अपना तो वैधव्य से भरा जीवन था ही, अब अपनी आंखो के सामने, अपनी बहुओं को, इसी वैधव्य के सफेद रंग में देखना, शायद पारुल के लिए इस पूरी दुनिया का सबसे बड़ा दर्द था।
पारुल भावुक होकर कहती हैं, “भगवान कभी-कभी हमारी बहुत कठिन परीक्षा लेता है, शायद मेरे साथ भी यही हो रहा था। मैं किसी भी मोड़ पर संभल पाती, इससे पहले ही मुझे दुखों के थपेड़े मिलते गए। मुझे ऐसा लगने लगा था कि शायद मैं सिर्फ त्रासदियों को झेलने के लिए पैदा हुई हूं। मैं अपनी बहुओं के चेहरों को जब देखती थी, तो अहसास होता था कि मैं इस दुनिया की सबसे बुरी औरत हूं, जिसके पास न उसका पति है और न उसके बेटे।”
पारुल बताती हैं कि इन घटनाओं के बाद वह बिलकुल जड़ बन चुकी थीं। यहां तक कि उसी बीच उनके दोनों भाइयों की भी मौत हो गई, लेकिन उसके लिए अब यह बात सामान्य हो चुकी थी। पति और दोनों बेटों की मौत के बाद भाइयों का न रहना, उनके लिए असहनीय था, लेकिन वह अब इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा मान चुकी थीं, जहां सिर्फ दर्द भरी विभीषिकाएं हैं, कोई सुख और अमन नहीं।
जीवन से सब कुछ हारकर, वह एक साल पहले शांति की तलाश में वृंदावन आईं और यहां मां शारदा आश्रम में रहने लगीं। भजन करते हुए राधा-रानी के मंदिरों में भटकने लगीं। उन्हें तलाश थी कि शायद कान्हा की भक्ति उन्हें इस दर्द से मुक्ति दिलाकर उनके अंतर्मन को शांति दिला सके और जो बेचैनी दशकों पहले उनके मन में घर कर गई है, वो बाहर निकल सके। 
कहते हैं कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं, भगवान जब दुःख देता है तो उसे सहने की इच्छाशक्ति भी देता है। पारुल को भी वो शांति और इच्छाशक्ति वृंदावन में आखिरकार मिल गई। राधारानी की भक्ति ने धीरे-धीरे उनके मन से विकारों को खत्म कर दिया और उसे शांति और संतुष्टि के भावों से भर दिया। उसकी जिंदगी में विधवा संताप और बेटे को खोने के दर्द ने जो अधूरापन छोड़ा था, उसे वृंदावन ने जीवन के सच्चे अर्थों से पूरा कर दिया। पारुल की बहू बंगाल में गांव में ही रहती है और स्वस्थ नहीं है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि राधा-रानी सब ठीक कर देंगी ।
पारुल जिस विधवा आश्रम  में रहती है, वहां रहने वाली समस्त विधवा माताओं को अब सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा कई प्रकार की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। सुबह-शाम राधा-कृष्ण का नाम जपते हुए, वह जीवन की सुंदर यादों में खोई रहती है। पारुल कहती हैं, “लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) सिर्फ हमारी सहायता नहीं करते, बल्कि हमारे साथ सभी त्योहारों में शरीक होते हैं और हमें यह अहसास दिलाते हैं कि हमारा भी परिवार है।”
पारुल एक खूबसूरत सी मुस्कान चेहरे पर बिखेरते हुए कहती हैं कि मैं वृंदावन में शांति के लिए आई थी, लेकिन मुझे सांसारिक जीवन के साथ सच्चे जीवन का मर्म भी यहां मिल गया। ‘सब यहीं रह जाएगा, सिर्फ आपका भक्तिभाव ही आपके साथ जाएगा।’ 



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