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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

प्रतिभा रॉय - वृंदावन ने उसके घाव भरे

प्रतिभा ने अपनी जिंदगी में सब-कुछ देखा है और अब वह सुकून से वृंदावन में ही अंत तक जीना चाहती हैं

‘मैं एक विधवा नहीं हूं, पर मैं कभी एक पत्नी भी नहीं थी। यह सब झूठ था। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी मानसिक रूप से बीमार थी, इसीलिए उन्हें और उनके बच्चों को मेरी आवश्यकता थी। यह सब झूठ था। वे चाहते थे कि उन्हें पूरी तरह से एक पूर्णकालिक नौकरानी मिले। मैं वास्तव में कभी नहीं चाहती थी, बस जरुरत थी। यह सब झूठ था ... और फिर उसने बोलना बंद कर दिया और कहा कि अब इस पर बातचीत करने का कोई मतलब है।’
यह कहानी है, पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले स्थित बलरामपुर की प्रतिभा रॉय की, जिन्होंने वर्ष 2003 से वृंदावन आने-जाने का सिलसिला शुरू किया।
प्रतिभा का विवाह 15 साल की उम्र में उनसे दुगनी उम्र के एक व्यक्ति (32) के साथ हुआ और यहीं से झूठ, पीड़ा और कठिनाइयों के एक दुखद सिलसिले की शुरुआत हुई। यह उनके पति की दूसरी शादी थी, जिसकी पहली पत्नी को शुरुआत में मानसिक रूप से बीमार महिला के रूप में दिखाया गया जो अपने माता-पिता के साथ रहती थी।
प्रतिभा को आश्वस्त किया गया कि पहली शादी से हुए दो बच्चों को एक मां की जरूरत थी। प्रतिभा उस परिवार को अपना सबकुछ देने के लिए तैयार थी। लेकिन एक सादे शादी समारोह के तुरंत बाद, जब वह नए घर पहुंची तो यह जानकर चौंक गई कि पहली पत्नी पहले से ही वहां रह रही थी और जो उन्हें बताया गया था वह सब झूठ था।
वह एक पत्नी से पूर्णकालिक नौकरानी बन गई। उसे बताया गया कि वह खुद के बच्चे नहीं पैदा कर सकती है। प्रतिभा के एक विवाहित जीवन के सारे सपने बिखर गए। वह वापस भी नहीं जा सकती थी, क्योंकि उनकी मां को लगता था कि यह परिवार के लिए समाज में शर्मिंदगी वाली बात होगी। प्रतिभा का बेरोजगार निकम्मा पति और उसकी पहली पत्नी दोनों मिलकर प्रतिभा को खूब पीटते थे। हालांकि शादी के 3 साल बाद उसने एक लड़की को जन्म दिया और उसके कुछ समय बाद उसे एक बेटा भी हुआ।
प्रतिभा सुबकते हुए बताती हैं कि जब मैंने बेटी को जन्म दिया, तो उन्हें इतनी फिक्र नहीं थी। लेकिन जब एक बेटा भी हो गया, तो मुझे क्रूरता से पीटा गया और मेरे बच्चे को मुझसे दूर कर दिया गया। मेरे बच्चों को कभी भी दूध और खाना नहीं दिया जाता था।
अपने रोते हुए भूखे बच्चों को देखकर प्रतिभा को बहुत तकलीफ होती थी। तो वह उनके लिए एक सिलाई स्कूल में सिलाई सिखाने का काम करने जाने लगीं। इस बात से अनजान कि यह सब इतना आसान नहीं था, वह फिर भी खुश थी कि उसके बच्चों के पास उचित हिस्सा होगा। लेकिन, वह जो कुछ भी कमाती थी, वह सब घर चलाने में चला जाता था।
अब वह आय का स्रोत बन गईं थीं। लेकिन समय के साथ स्पॉन्डिलाइटिस ने उन्हें घेर लिया। साथ ही उनकी आंखें दिन-ब-दिन कमजोर हो रही थीं। और वह लंबे समय तक काम नहीं कर सकीं। लेकिन जैसे ही पैसा आना बंद हुआ, दोनों पति-पत्नी उनके साथ दोबारा मार-पीट करने लगे।
प्रतिभा ने यहां तक तो झेला और इसके बाद, वह वृंदावन चली गईं। प्रतिभा निश्चय करके वृंदावन तो चली गईं, लेकिन वहां रहने का फैसला नहीं कर सकीं। वह यहां एक से डेढ़ महीने तक रहीं और फिर अपने परिवार और बेटे से मिलने के लिए घर वापस आ गईं। वह घर पर ही अपने जीवन-यापन की की कोशिश करने लगीं, लेकिन एक वर्ष या इससे कुछ वक्त के बाद, प्रतिभा वृंदावन के लिए निकल पड़ीं। लेकिन उसके मन में कहीं एक उम्मीद की किरण जिंदा थी जो बार-बार उसे  उसे बलरामपुर वापस ले जाती थी ​िक शायद सब कुछ ठीक हो जाए।
वृंदावन में, वह ‘ओम नमः शिवाय आश्रम’ में रहकर अपना जीवन-यापन का करने लगीं और इसके बदले में वह आश्रम के लिए सफाई से लेकर खाना पकाने और भजन गाने का काम करने लगीं। 
कुछ समय पहले, प्रतिभा के बेटे और बहू वृंदावन आए और उन्हें घर लौटने के लिए मना लिया। प्रतिभा को संदेह तो था, लेकिन वह उनके अनुरोध को मना नहीं कर सकीं। वह बलरामपुर वापस चली गईं, लेकिन यह आखिरी बार था। क्योंकि किसी का भी प्रतिभा के प्रति जरा सा भी रवैया नहीं बदला था। वे लोग अब प्रतिभा को मारते नहीं थे, लेकिन उनका व्यवहार बहुत बुरा हो चुका था। 
प्रतिभा कहती हैं कि मैंने सोचा कि इस सब का फिर क्या मतलब था। उन्होंने तब मेरा सम्मान नहीं किया था, वे अब भी मेरा सम्मान नहीं करते हैं। उन्होंने कभी भी मेरी परवाह नहीं थी और इस तरह, यह हमेशा मेरे साथ होने वाला था। इसीलिए मैंने एक सच्चे, खुश परिवार की उम्मीद छोड़ दी। 
उस दिन के बाद से, प्रतिभा ने कभी पीछे नहीं देखा। प्रतिभा अब 68 वर्ष की हो चुकी हैं। इस जीवन में, उन्होंने सब कुछ देख लिया है। उन्होंने झूठ सहा, मार खाई, यातनाएं झेली, कई चोटों और स्ट्रोक का सामना किया। जिस तरह की जिंदगी की प्रतिभा ने कल्पना की थी, वैसी जिंदगी से वह कोसों दूर थी। लेकिन वह पूरे समय मजबूत से खड़ी रहीं। यह उनकी 'प्रतिभा' ही थी जिसने उन्हें सभी उत्पीड़न से ऊपर उठाया और उनके शांतिपूर्ण जीवन के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
वह कहती हैं कि वृंदावन मुझे शांति देता है। मैं भजन करती हूं। वृंदावन ने मेरे घाव भरे हैं। अब मैं सुलभ की विधवा-आश्रम में रहती हूं। मुझे अब जीवित रहने के लिए काम करने की जरुरत नहीं है। आश्रम मेरा ख्याल रखता है। मुझे पता 
है कि मेरे पास अब बहुत अधिक दिन शेष नहीं हैं और मुझे खुशी है कि मेरे ये आखिरी दिन शांतिपूर्ण हैं। वृंदावन वह जगह है जहां मैं शांति से मर सकूंगी।



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