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मंगलवार, 25 जून 2019

रीना गुप्ता - वृंदावन वैधव्य के जीवन में भी रंग भर देता है

खुशहाल जिंदगी की नैया आसानी से जीवन के सागर पर तैर रही थी, लेकिन तभी दंगों का एक जलजला आया और सबकुछ हमेशा के लिए बदल गया

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली रीना गुप्ता ने अपनी जिंदगी में उस दर्द को महसूस किया है, जिसको अब इतिहास में पढ़ाया जाता है। उन्होंने क्षोभ, निराशा और उजाड़पन के उस दौर को देखा, जिसने उन्हें सोचने को मजबूर और मन को हमेशा के लिए अशांत कर दिया। लेकिन जिंदगी के एक मोड़ पर अचानक उनका आना, उन कुंज गलियों की तरफ हुआ जहां कभी अपनी गोपियों से घिरे भगवान कृष्ण बांसुरी बजाया करते थे। और इन्हीं गलियों ने रीना के अशांत मन को संतुष्टि और शांति दी।
रीना 12 साल की थीं, जब उनकी शादी बांग्लादेश (उस वक्त पूर्वी पकिस्तान) के 20 साल के एक व्यक्ति से कर दी गई। वह अपने पति के साथ बांग्लादेश के खुलना शहर में स्थित प्रसिद्ध मोंगला पोर्ट के पास रहती थीं। उनका जीवन शांति से खुशहाली के रास्ते पर चल रहा था। लेकिन तभी कुछ ऐसा घटित हुआ जिसकी कल्पना रीना ने शायद कभी सपने में भी नहीं की होगी।
बंगाल से अलग होकर बने पूर्वी पाकिस्तान में साल 1971 में दंगे भड़क उठे। हर तरफ खून और लाशों का मंजर था। इतिहास के सबसे क्रूरतम दंगों में से एक, इस दंगे ने रीना की जिंदगी बदल दी।
रीना भावुक होकर भारी मन से बताती हैं, ‘हमारा जीवन सामान्य रूप से चल रहा था और हमें ऐसी कोई परेशानी नहीं थी। लेकिन मुझे नहीं पता था कि हमारी खुशहाल जिंदगी में एक ऐसा जलजला आने वाला है जो सब कुछ बदल देगा। मेरी आंखों के सामने लोग काटे जा रहे थे। जिधर देखती थी सिर्फ लाशें नजर आती थीं। लोगों के घर जलाए जा रहे थे। शवों को गाड़ियों में भर-भरकर नदी में फेंका जा रहा था। दंगों की इस विभीषिका को देख मेरा मन द्रवित हो गया, ऐसा लगने लगा कि शायद यह दुनिया मिथ्या है। अगर इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती है तो जीवन जीने का कोई मतलब नहीं है।’
भारत में सत्तासीन इंदिरा सरकार ने उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान में रह रहे भारतीयों को वापस बुला लिया। उन्हें जीवन जीने के नए साधन मुहिया कराए गए, गुजारे के लिए उनकी मदद की गई। इसी मदद से रीना और उसके पति ने फिर से जीवन के संघर्षों में अपना मुकाम तलाशने की कोशिश शुरू की। लेकिन रीना का अंतर्मन अब इतना बेचैन हो चुका था कि उसके अंदर जीवन की आस खत्म सी हो गई थी। 
वह एक जिंदा लाश सी, बस अपना कर्म करती जा रही थी, लेकिन जीवन के रस का स्वाद अब शायद हमेशा के लिए बहुत तीखा हो चुका था। इस सब के बीच, उसने 2 लड़कों और 2 लड़कियों को जन्म दिया। बच्चों के पालन-पोषण में उसका समय व्यतीत होने लगा, उसे लगा कि शायद अब उसके अशांत मन को शांति मिल सके। लेकिन वह गलत थी, अभी भी रह-रहकर दंगों की आग में सुलगते लोग उसकी आंखों के सामने आ जाते थे।
रीना कहती हैं, ‘मैं आज भी नहीं भूली कि किस तरह पागल लोग औरतों के अंगों को काटकर, उनकी लाश को पानी में फेंक रहे थे। भीड़ लोगों को पकड़कर, आग लगा रही थी। मेरे सामने अक्सर खून से सने लोगों के चेहरे आ जाते थे, जो मन को और बेचैन कर देते थे।’
इसी कशमकश में और शांति की तलाश में एक दिन, उन्होंने वृंदावन आने के बारे में सोचा और लगभग 15 साल पहले वह वृंदावन की सड़कों पर भटकने लगी, लेकिन राधा और कृष्ण के मंदिरों में घूमते हुए उन्हें उस असीम शांति का अनुभव हुआ, जिसे शायद दंगों की आग ने छीन लिया था। 
रीना एक संतुष्टि के भाव वाली मुस्कान चेहरे पर बिखेरते हुए कहती हैं, ‘जब मैं वृंदावन आ रही थी तब सोचा नहीं था कि जो अशांति और बेचैनी मेरे मन में सालों पहले घर कर गयी थी, वह कभी मेरे मन से निकल पाएगी। लेकिन यहां की मिट्टी में कुछ तो ऐसा है जो सब कुछ ठीक कर देता है। वृंदावन ने मुझे वो दिया जिसकी तलाश में, मैं सालों से भटक रही थी।’
रीना पहली बार वृंदावन आई और यहां कुछ ऐसा मन रमा, कि वापस घर जाकर उन्होंने अपना फैसला अपने पति और बच्चों को सुनाते हुए कहा कि अब वह वृंदावन की दासी बनकर ही रहेंगी। 
4 साल पहले उनके पति गुजर गए और उनके जीवन में वैधव्य का सफेद रंग भर गया। लेकिन जो साहस और शांति उन्हें वृंदावन ने दी थी, इसी वजह से, वह सबकुछ झेल सकीं। वृंदावन ने ही, उन्हें पहले अपने पति से अलग होने और फिर हमेशा के लिए बिछड़ने के दर्द से लड़ने की हिम्मत दी। उनके जीवन में परमात्मा के भाव और संतुष्टि का जो रस वृंदावन ने घोला, इसी से, वह आज अपनी जिंदगी को मुकम्मल मानती हैं।
वह पहले वृंदावन में एक माता जी के पास, उनके आश्रम में रहती थीं और उनकी सेवा करती थीं। लेकिन अब वह एक ऐसे विधवा आश्रम में रहती हैं, जहां कि महिलाओं की देखरेख तथा अन्य सुविधाएं सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन द्वारा प्रदान की जाती है।सुबह-शाम भजन करते हुए जिस आनंद की अनुभूति उन्हें होती है, यही उनके जीवन की कमाई की है।
रीना कहती हैं, ‘लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) की शरण में, मैं खुद को अपने जीवन की सबसे बेहतर स्थिति में पाती हूं, क्योंकि यहां मुझे किसी चीज की चिंता नहीं करनी है। बस मुझे, राधा-कृष्ण के भजन गाने हैं और खुद को तलाश करना है।’
चेहरे पर एक खूबसूरत मुस्कान के साथ रीना कहती हैं कि वैधव्य भरे जीवन में भी वृंदावन और लाल बाबा रंग भर देते हैं। 



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