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बुधवार, 19 जून 2019

टॉल्सटॉय को याद करना क्यों जरूरी?

टॉल्सटॉय ने अपने अंतिम दिनों में लोकशिक्षण के लिए जो निबंध, नाटक व कहानियां लिखे उनमें उन्होंने समतावादी ग्रामीण समाज को बहुत प्रतिष्ठित किया

दुनिया की अनेक बुनियादी समस्याओं के समाधान प्राप्त करने के लिए 21वीं शताब्दी में महात्मा गांधी के विचारों को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पर एक ऐसे विचारक भी थे, जिन्हें महात्मा गांधी भी अपना गुरु मानते थे और गांधी जी के जिस जीवन दर्शन को आज बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, उसे अपनाने में उन्हें इस विचारक से बहुत प्रेरणा मिली थी।
ये विचारक व दार्शनिक थे लियो टॉल्सटॉय। विश्व स्तर पर उन्हें सबसे अधिक ख्याति अपने उपन्यासों ‘वार एंड पीस’ व ‘एना केरानीना’ से मिली और इसमें कोई संदेह नहीं कि ये महान साहित्यिक उपलब्धियां हैं। पर टॉल्सटॉय अपने जीवन में आगे बढ़ने पर स्वयं इन जीनियस उपलब्धियों को कम महत्व देने लगे थे व उनके लिए बाद के दिनों में लिखे गए नीति निबंध, कहानियां व नाटक अधिक महत्वपूर्ण होते गए जो उन्होंने विश्व में बुनियादी सामाजिक बदलाव लाने के लिए लोक-शिक्षण की दृष्टि से लिखे।
यह बहुत कम लोगों को पता है कि इनमें से अनेक कहानियों का हिंदी अनुवाद अपने लेखन के आरंभिक दिनों में मुंशी प्रेमचंद ने स्वयं किया। गांधी जी की तरह प्रेमचंद भी टॉल्सटॉय से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने टॉल्सटॉय की 23 नीति कथाओं का भारतीय परिवेश के अनुसार रूपांतर कर ‘प्रेम प्रभाकर’ के नाम से प्रकाशित करवाया था। अमृत राय ने ‘कलम का सिपाही’ में लिखा है कि अपनी कुछ ‘सेवामार्ग’ व ‘उपदेश’ जैसी नीति कथाएं भी उन्होंने टॉल्सटॉय के प्रभाव में लिखी थीं और लेखनी व जीवन दोनों में अनेक सदगुणों को टॉल्सटॉय की प्रेरणा से प्राप्त किया था। इससे भी पहले महात्मा गांधी ने टॉल्सटॉय की नैतिक कथाओं का अनुवाद गुजराती में किया था।
महात्मा गांधी पहले तो टॉल्सटॉय के लेखन से बहुत प्रभावित हुए व फिर उन्होंने आगे मार्गदर्शन के लिए टॉल्सटॉय को दक्षिण अफ्रीका से एक पत्र लिखा। उस समय टॉल्सटॉय बहुत वृद्ध हो चुके थे व कठिन स्थितियों से गुजर रहे थे। इसके बावजूद उन्होंने गांधी जी को उत्तर में विस्तृत पत्र लिखा। यह एक बहुत महत्वपूर्ण पत्र है जिसका गांधी जी पर गहरा असर हुआ। उन्होंने सही जीवनमार्ग की तलाश में आश्रम विकसित किया तो इसका नाम टॉल्सटॉय के सम्मान में ही रखा।
टॉल्सटॉय ने अपने अंतिम दिनों में लोकशिक्षण के लिए जो निबंध, नाटक व कहानियां लिखीं उनमें उन्होंने समतावादी ग्रामीण समाज को बहुत प्रतिष्ठित किया। जहां उस समय साम्यवादियों का झुकाव शहरों व औद्योगिक मजदूरों में क्रांति लाने की ओर था, वहां टॉल्सटॉय ने इससे हटकर ग्रामीण जीवन को प्रतिष्ठित किया पर साथ में इसे समतावादी बनाने के लिए बहुत जोर दिया।
उनका मानना था कि जमींदारों को अपनी भूमि उन मेहनतकश किसानों व खेत मजदूरों को देनी चाहिए जो इस भूमि पर मेहनत करते रहे हैं व इसके वास्तविक हकदार हैं। इस तरह के समतावादी विचारों के लिए वे अपने अभिजात सामंती वर्ग के विरोध में खड़े नजर आए। उन्होंने इस समतावादी ग्रामीण समाज के समर्थन में ईसाई धार्मिक विचारों की अपने ढंग से व्याख्या की जिसके कारण चर्च के बड़े मठाधिपति भी उनके विरुद्ध हो गए।
टॉल्सटॉय ने सभी तरह के नशे का बहुत मौलिक ढंग से विरोध किया जो आज भी नशा विरोधी आंदोलनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने ऐसे बुनियादी सवाल उठाए कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में लोग नशा क्यों करते हैं। उन्होंने युद्ध व पूरी सैन्य व्यवस्थाओं का भरपूर विरोध किया और दुनिया से युद्ध को सदा के लिए समाप्त करने के लिए लोगों को कहा। अमन-शांति चाहने वालों पर उनके विचारों का गहरा असर पड़ा।
सभी तरह के भोग विलास, उपभोक्तावाद, फिजूलखर्ची का टॉल्सटॉय ने अपने जीवन के दूसरे भाग में जमकर विरोध किया। अपने जीवन के पहले भाग में टॉल्सटॉय ने भोग-विलासिता ऐंद्रिक सुख खूब भोगे थे व युद्ध में भागीदारी भी की थी, पर इसको नजदीक से देखने के बाद वे इन प्रवृतियों के जबरदस्त विरोधी के रूप में उभरे। दुर्भाग्यवश उनके परिवार और रिश्तेदारों ने यह बदलाव स्वीकार नहीं किया व वे निरंतर अकेले पड़ते गए। अनेक संकटों से बाहर निकलने की राह तलाश रही दुनिया के लिए टॉल्सटॉय के विचार महत्वपूर्ण हैं।



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