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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

त्याग न टके रे वैराग बिना...

गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में जहां अपने बाल विवाह के प्रसंग को बेबाकी से लिखा है, वहीं उनके अनुभवों से यह भी जाहिर होता है कि विषयासक्ति से मुक्ति की ललक भी उनमें उन्हीं दिनों पैदा होने लगी थी

प्रथम भाग

3. बाल-विवाह
मैं चाहता हूं कि मुझे यह प्रकरण न लिखना पड़ता। लेकिन इस कथा में मुझको ऐसे कितने कड़वे घूंट पीने पड़ेंगे। सत्य का पुजारी होने का दावा करके मैं और कुछ कर ही नहीं सकता। यह लिखते हुए मन अकुलाता है कि तेरह साल की उम्र में मेरा विवाह हुआ था। आज मेरी आंखों के सामने बारह-तेरह वर्ष के बालक मौजूद है। उन्हें देखता हूं और अपने विवाह का स्मरण करता हूं तो मुझे अपने ऊपर दया आती है और इन बालकों को मेरी स्थिति से बचने के लिए बधाई देने की इच्छा होती है। तेरहवें वर्ष में हुए अपने विवाह के समर्थन में मुझे एक भी नैतिक दलील नहीं सूझती है।
पाठक यह न समझें कि मैं सगाई की बात लिख रहा हूं। काठियावाड़ में विवाह का अर्थ लगन है, सगाई नहीं। दो बालकों को ब्याहने के लिए मां-बाप के बीच होनेवाला करार सगाई है। सगाई टूट सकती है। सगाई के रहते वर यदि मर जाए तो कन्या विधवा नहीं होती। सगाई में वर-कन्या के बीच कोई संबंध नहीं रहता। दोनों को पता नहीं होता। मेरी एक-एक करके तीन बार सगाई हुई थी। ये तीन सगाइयां कब हुईं, इसका मुझे कुछ पता नहीं। मुझे बताया गया था कि दो कन्याएं एक के बाद एक मर गईं। इसीलिए मैं जानता हूं कि मेरी तीन सगाइयां हुई थी। कुछ ऐसा याद पड़ता है कि तीसरी सगाई कोई सात साल की उम्र में हुई होगी। लेकिन मैं नहीं जानता कि सगाई के समय मुझसे कुछ कहा गया था। विवाह में वर-कन्या की आवश्यकता पड़ती है, उसकी विधि होती है और मैं जो लिख रहा हूं सो विवाह के विषय में ही है। विवाह का मुझे पूरा-पूरा स्मरण है।
पाठक जान चुके हैं कि हम तीन भाई थे। उनमें सबसे बड़े का ब्याह हो चुका था। मंझले भाई मुझसे दो या तीन साल बड़े थे। घर के बड़ों ने एक साथ तीन विवाह करने का निश्चय किया। मंझले भाई का, मेरे काकाजी के छोटे लड़के का, जिनकी उम्र मुझसे एकाध साल अधिक रही होगी, और मेरा। इसमें हमारे कल्याण की बात नहीं थी। हमारी इच्छा की तो थी ही नहीं। बात सिर्फ बड़ों की सुविधा और खर्च की थी।
हिंदू-संसार में विवाह कोई ऐसी-वैसी चीज नहीं। वर-कन्या के माता-पिता विवाह के पीछे बर्बाद होते हैं, धन लुटाते हैं और समय लुटाते हैं। महीनों पहले से तैयारियां होती हैं। कपड़े बनते हैं, गहने बनते हैं, जातिभोज के खर्च के हिसाब बनते हैं, पकवानों के प्रकारों की होड़ मचती है। औरतें, गला हो चाहे न हो तो भी गाने गा-गाकर अपनी आवाज बैठा लेती हैं, बीमार भी पड़ती हैं। पड़ोसियों की शांति में खलल पहुंचाती हैं। बेचारे पड़ोसी भी अपने यहां प्रसंग आने पर यही सब करते हैं, इसीलिए शोरगुल, जूठन, दूसरी गंदगियां, सब कुछ उदासीन भाव से सह लेते हैं। ऐसा झमेला तीन बार करने के बदले एक बार ही कर लिया जाए, तो कितना अच्छा हो? खर्च कम होने पर भी ब्याह ठाठ से हो सकता है, क्योंकि तीन ब्याह एक साथ करने पर पैसा खुले हाथों खर्चा जा सकता है। 
पिताजी और काकाजी बूढ़े थे। हम उनके आखिरी लड़के ठहरे। इसीलिए उनके मन में हमारे विवाह रचाने का आनंद लूटने की वृति भी रही होगी। इन और ऐसे दूसरे विचारों से ये तीनों विवाह एक साथ करने का निश्चय किया गया और सामग्री जुटाने का काम तो जैसा कि मैं कह चुका हूं महीनों पहले से शुरू हो चुका था।
हम भाइयों को तो सिर्फ तैयारियों से ही पता चला कि ब्याह होनेवाले हैं। उस समय मन में अच्छे-अच्छे कपड़े पहनने, बाजे बजने, वर यात्रा के समय घोड़े पर चढ़ने, बढ़िया भोजन मिलने, एक नई बालिका के साथ विनोद करने आदि की अभिलाषा के सिवा दूसरी कोई खास बात रही हो, इसका मुझे कोई स्मरण नहीं है। विषय-भोग की वृति तो बाद में आई। वह कैसे आई, इसका वर्णन कर सकता हूं, पर पाठक ऐसी जिज्ञासा न रखें। मैं अपनी शरम पर परदा डालना चाहता हूं। जो कुछ बतलाने लायक है, वह इसके आगे आएगा। किंतु इस चीज के ब्योरे का उस केंद्र बिंदु से बहुत ही थोड़ा संबंध है, जिसे मैंने अपनी निगाह के सामने रखा है।
हम दो भाइयों को राजकोट से पोरबंदर ले जाया गया। वहां हल्दी चढ़ाने आदि की विधि हुई, वह मनोरंजन होते हुए भी उसकी चर्चा छोड़ देने लायक है। पिताजी दीवान थे। फिर भी थे तो नौकर ही, तिस पर राज-प्रिय थे। इसीलिए अधिक पराधीन रहे। ठाकुर साहब ने आखिरी घड़ी तक उन्हें छोड़ा नहीं। अंत में जब छोड़ा तो ब्याह के दो दिन पहले ही रवाना किया। उन्हें पहुंचाने के लिए खास डाक बैठाई गई। पर विधाता ने कुछ और ही सोचा था। राजकोट से पोरबंदर साठ कोस है। बैलगाड़ी से पांच दिन का रास्ता था। पिताजी तीन दिन में पहुंचे। आखिरी में तांगा उलट गया। पिताजी को कड़ी चोट आई। हाथ पर पट्टी, पीठ पर पट्टी। विवाह-विषयक उनका और हमारा आनंद आधा चला गया। फिर भी ब्याह तो हुए ही। लिखे मुहूर्त कहीं टल सकते हैं? मैं तो विवाह के बाल-उल्लास में पिताजी का दुख भूल गया!
मैं पितृ-भक्त तो था ही, पर विषय-भक्त भी वैसा ही था। यहां विषय का मतलब इंद्रिय का विषय नहीं है, बल्कि भोग-मात्र है। माता-पिता की भक्ति के लिए सब सुखों का त्याग करना चाहिए, यह ज्ञान तो आगे चलकर मिलनेवाला था। तिस पर भी मानो मुझे भोगेच्छा का दंड ही भुगतना हो। इस तरह मेरे जीवन में एक विपरीत घटना घटी, जो मुझे आज तक अखरती है। जब-जब निष्कुलानंद का ‘त्याग न टके रे वैराग बिना, करिए कोटि उपाय जी’ गाता हूं या सुनता हूं, तब-तब वह विपरीत और कड़वी घटना मुझे याद आती है और शरम आती है।
पिताजी ने शरीर से पीड़ा भोगते हुए भी बाहर से प्रसन्न दिखने का प्रयत्न किया और विवाह में पूरी तरह योग दिया। पिताजी किस-किस प्रसंग में कहां-कहां बैठे थे, इसकी याद मुझे आज भी जैसी की वैसी बनी है। बाल-विवाह की चर्चा करते हुए पिताजी के कार्य की जो टीका मैंने आज की है, वह मेरे मन में उस समय थोड़े ही की थी? तब तो सब कुछ योग्य और मनपसंद ही लगा था। ब्याहने का शौक था और पिताजी जो कर रहे ठीक ही कर रहे हैं, ऐसा लगता था। इसीलिए उस समय के स्मरण ताजे हैं।
मंडप में बैठे, फेरे फिरे, कंसार खाया-खिलाया और तभी से वर-वधू साथ में रहने लगे। वह पहली रात! दो निर्दोष बालक अनजाने संसार-सागर में कूद पड़े। भाभी ने सिखलाया कि मुझे पहली रात में कैसा बर्ताव करना चाहिए। धर्मपत्नी को किसने सिखलाया, सो पूछने की बात मुझे याद नहीं। पूछने की इच्छा तक नहीं होती। पाठक यह जान लें कि हम दोनों एक-दूसरे से डरते थे, ऐसा भास मुझे है। एक-दूसरे से शरमाते तो थे ही। बातें कैसे करना, क्या करना, सो मैं क्या जानूं? प्राप्त सिखापन भी क्या मदद करती? लेकिन क्या इस संबंध में कुछ सिखाना जरूरी होता है? यहां संस्कार बलवान है, वहां सिखावन सब गैर-जरूरी बन जाती है। धीरे-धीरे हम एक-दूसरे को पहचानने लगे, बोलने लगे। हम दोनों बराबरी की उम्र के थे। पर मैंने तो पति की सत्ता चलाना शुरू कर दिया।

4. पतित्व        
जिन दिनों मेरा विवाह हुआ, उन दिनों निबंधों की छोटी-छोटी पुस्तिकाएं -पैसे-पैसे या पाई-पाई की, सो तो कुछ याद नहीं- निकलती थीं। उनमें दंपती-प्रेम, कमखर्ची, बाल विवाह आदि विषयों की चर्चा रहती थी। उनमें से कुछ निबंध मेरे हाथ में पड़ते और मैं उन्हें पढ़ जाता। मेरी यह आदत तो थी कि पढ़े हुए में से जो पसंद न आए उसे भूल जाना और जो पसंद आए उस पर अमल करना। मैंने पढ़ा था कि एक पत्नी-व्रत पालना पति का धर्म है। बात हृदय में रम गई। सत्य का शौक तो था ही, इसीलिए पत्नी को धोखा तो दे ही नहीं सकता था। इसी से यह भी समझ में आया कि दूसरी स्त्री के साथ संबंध नहीं रहना चाहिए। छोटी उम्र में एक पत्नी-व्रत के भंग की संभावना कम ही रहती है।
पर इन सद्विचारों का एक बुरा परिणाम निकला। अगर मुझे एक पत्नी-व्रत पालना है, तो पत्नी को एक पति-व्रत पालना चाहिए। इस विचार के कारण मैं ईर्ष्यालु पति बन गया। ‘पालना चाहिए’ में से मैं ‘पलवाना चाहिए’ के विचार पर पहुंचा। अगर पलवाना है तो मुझे पत्नी की निगरनी रखनी चाहिए। मेरे लिए पत्नी की पवित्रता में शंका करने का कोई कारण नहीं था। पर ईर्ष्या कारण क्यों देखने लगी? मुझे हमेशा यह जानना ही चाहिए कि मेरी स्त्री कहां जाती है। इसीलिए मेरी अनुमति के बिना वह कहीं जा ही नहीं सकती। यह चीज हमारे बीच दुखद झगड़े की जड़ बन गई। बिना अनुमति के कहीं भी न जा सकना तो एक तरह की कैद ही हुई। पर कस्तूरबाई ऐसी कैद सहन करनेवाली थी ही नहीं। जहां इच्छा होती, वहां मुझसे बिना पूछे जरूर जाती। मैं ज्यों-ज्यों दबाव डालता, त्यों-त्यों वह अधिक स्वतंत्रता से काम लेती  और मैं अधिक चिढ़ता। इससे हम बालकों के बीच बोलचाल का बंद होना एक मामूली चीज बन गई। कस्तूरबाई ने जो स्वतंत्रता बरती, उसे मैं निर्दोष मानता हूं। जिस बालिका के मन में पाप नहीं है, वह देव-दर्शन के लिए जाने पर या किसी से मिलने जाने पर दबाव क्यों सहन करें? अगर मैं उस पर दबाव डालता हूं, तो वह मुझ पर क्यों न डाले? ...यह तो अब मुझे समझ में आ रहा है। उस समय तो मुझे अपना पतित्व सिद्ध करना था। लेकिन पाठक यह न मानें कि हमारे गृहजीवन में कहीं भी मिठास नहीं थी। मेरी वक्रता की जड़ प्रेम में थी। मैं अपनी पत्नी को आदर्श पत्नी बनाना चाहता था। मेरी यह भावना थी कि वह स्वच्छ बने, स्वच्छ रहे, मैं सीखूं सो सीखे, मैं पढ़ूं सो पढ़े और हम दोनों एक दूसरे में ओत-प्रोत रहें।
कस्तूरबाई में यह भावना थी या नहीं, इसका मुझे पता नहीं। वह निरक्षर थी। स्वभाव से सीधी, स्वतंत्र, मेहनती और मेरे साथ तो कम बोलनेवाली थी। उसे अपने अज्ञान का असंतोष न था। अपने बचपन में मैंने कभी उसकी यह इच्छा नहीं जानी कि मेरी तरह वह भी पढ़ सके तो अच्छा हो। इसमें मैं मानता हूं कि मेरी भावना एकपक्षीय थी। मेरा विषय-सुख एक स्त्री पर ही निर्भर था और मैं उस सुख का प्रतिघोष चाहता था। जहां प्रेम एक पक्ष की ओर से होता है वहां सर्वांश में दुख तो नहीं ही होता। मैं अपनी स्त्री के प्रति विषायासक्त था। शाला में भी उसके विचार आते रहते। कब रात पड़े और कब हम मिलें, यह विचार बना ही रहता। वियोग असह्य था। अपनी कुछ निकम्मी बकवासों से मैं कस्तूरबाई को जगाए ही रहता। मेरा खयाल है कि इस आसक्ति के साथ ही मुझमें कर्तव्य-परायणता न होती, तो मैं व्याधिग्रस्त होकर मौत के मंह में चला जाता अथवा इस संसार में बोझरूप बनकर जिंदा रहता। ‘सवेरा होते ही नित्यकर्म में तो लग जाना चाहिए, किसी को धोखा तो दिया ही नहीं जा सकता’ ...अपने इन विचारों के कारण मैं बहुत से संकटों से बचा हूं।
मैं लिख चुका हूं कि कस्तूरबाई निरक्षर थी। उसे पढ़ाने का मेरी बड़ी इच्छा थी। पर मेरी विषय-वासना मुझे पढ़ाने कैसे देती? एक तो मुझे जबरदस्ती पढ़ाना था। वह भी रात के एकांत में ही हो सकता था। बड़ों के सामने तो स्त्री की तरफ देखा भी नहीं जा सकता था। फिर बातचीत कैसे होती? उन दिनों काठियावाड़ में घूंघट निकालने का निकम्मा और जंगली रिवाज था। आज भी काफी हद तक मौजूद है। इस कारण मेरे लिए पढ़ाने की परिस्थितियां भी प्रतिकूल थीं। अतएव मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि जवानी में पढ़ाने के जितने प्रयत्न मैंने किए, वे सब लगभग निष्फल हुए। जब मैं विषय की नींद से जागा, तब तो सार्वजनिक जीवन में कूद चुका था। इसीलिए अधिक समय देने की मेरी स्थिति नहीं रही थी। शिक्षकों के द्वारा पढ़ाने के मेरे प्रयत्न भी व्यर्थ सिद्ध हुए। यही कारण है कि आज कस्तूरबाई की स्थिति मुश्किल से पत्र लिख सकने और साधारण गुजराती समझ सकने की है। मैं मानता हूं कि अगर मेरा प्रेम विषय से दूषित न होता तो आज वह विदुषी स्त्री होती। मैं उसके पढ़ने के आलस्य को जीत सकता था, क्योंकि मैं जानता हूं कि शुद्ध प्रेम के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
यों पत्नी के प्रति विषायासक्त होते हुए भी मैं किसी कदर कैसे बच सका, इसका एक कारण बता चुका हूं। एक और भी बताने लायक है। सैकड़ों अनुभवों के सहारे मैं इस परिणाम पर पहुंच सका हूं कि जिसकी निष्ठा सच्ची है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान ही कर लेते हैं। हिंदू समाज में यदि बाल विवाह का घातक रिवाज है, तो साथ ही उससे मुक्ति दिलानेवाला रिवाज भी है। माता-पिता बालक वर-वधू को लंबे समय तक एक साथ नहीं रहने देते। बाल-पत्नी का आधे से अधिक समय पीहर में बीतता है। यही बात हमारे संबंध में भी हुई। मतलब यह कि तेरह से उन्नीस साल की उम्र तक छुटपुट मिलाकर कुल तीन साल से अधिक समय तक साथ नहीं रहे होंगे। छह-आठ महीने साथ रहते, इतने में मां-बाप के घर का बुलावा आ ही जाता। उस समय तो वह बुलावा बहुत बुरा लगता था, पर उसी के कारण हम दोनों बच गए। फिर तो अठारह साल की उम्र में विलायत गया, जिससे लंबे समय का सुंदर वियोग रहा। विलायत से लौटने पर भी हम करीब छह महीने साथ में रहे होंगे, क्योंकि मैं राजकोट और बंबई के बीच जाता-आता रहता था। इतने में दक्षिण अफ्रीका का बुलावा आ गया। इस बीच तो मैं अच्छी तरह जाग्रत हो चुका था।



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