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शुक्रवार, 21 जून 2019

'सेवा' की आधी दुनिया

इला भट्ट देश में महिला सशक्तीकरण से जुड़ा संभवत: सबसे बड़ा नाम है। बड़ी बात है कि महिला स्वावलंबन के लिए उन्होंने अपनी संस्था 'सेवा' के जरिये अब तक जो भी प्रयोग किए वे गांधीवादी अहिंसा से प्रभावित हैं

बात वर्ष 1990 के आसपास की होगी। बिहार के भागलपुर में 'सेवा' का एक केंद्र चलता है। इस केंद्र से जुड़ी महिलाएं वहीं चल रहे गांधी शांति प्रतिष्ठान के केंद्र से भी जुड़ी हैं। लिहाजा, जब वहां लोगों को पता चला कि इला भट्ट आने वाली हैं, तो उन्हें देखने और मिलने वालों की अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई। यही पहली मुलाकात थी मेरी इला बहन से। तब उन्हें ज्यादा नहींं जानता था, पर जब उन्हें वहां सुना-देखा तो उनके साधारण से व्यक्तित्व में भरी असाधारण ऊर्जा और प्रेरणा से प्रभावित हुए बिना नहींं रह सका। उन्होंने तब हम लोगों से बातचीत के बीच कहा था कि महिलाएं समय और समाज का इंजन हैं, इन्हें सवारी डिब्बों की तरह हम ढोएंगे तो हम हर लिहाज से पिछड़ जाएंगे। इससे जुड़ा बड़ा खतरा यह है कि यह पिछड़ापन विकास से लेकर संस्कृति तक हमें हर स्तर पर देखनी-सहनी होगी।

आधुनिक महिलावादी तल्खी नहींं

इला भट्ट के जीवन और महिलाओं को लेकर उनके काम और संकल्प को देखें तो उनमेंं आधुनिक और तल्ख महिलावादी नजरिये के बजाय अहिंसक और समन्वयी दृष्टि दिखती है। वह धैर्य से और दीर्घ योजना के साथ तो काम करती हैं और ऐसा करते हुए अहिंसक रास्ता भी अपनाती हैं। कह सकते हैं कि यह कहीं न कहीं वही रचनात्मक दृष्टि है, जो आधी दुनिया को लेकर गांधी की रही है। वैसे यह भी संयोग ही है कि इला बहन भी गांधी जी की तरह गुजराती हैं।

पिता वकील, मां सामाजिक कार्यकर्ता

इला बहन का जन्म 7 सितंबर 1933 को अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता जाने-माने वकील थे और मां सामाजिक कार्यकर्ता। इला बहन बताती हैं कि उन्हें महिलाओं के लिए काम करने की हिम्मत अपने माता-पिता से ही मिली। उनका बचपन सूरत की गलियों में गुजरा। उन्होंने 15 साल की उम्र में मैंट्रिक पास कर ली थी। देश जब आजाद हुआ तो वो कॉलेज में पढ़ रही थीं। वर्ष 1954 में इला ने कानून की पढ़ाई पूरी कर ली और उन्हें 'हिंदू लॉ' पर रिसर्च के लिए गोल्ड मेडल भी मिला।

गांधी का प्रभाव और रास्ता

पढ़ाई के बाद क्या करना है, इस बात को लेकर उनके भीतर कोई दुविधा नहींं थी। वे बताती हैं, 'करियर को तलाशने में मुझे कोई दिक्कत नहींं हुई। मुझे अपना रास्ता गांधीजी ने पहले ही बता दिया था।' दरअसल, उन पर गांधी का प्रभाव बचपन से ही था। वो उनके भाषण सुना करती थीं और उनके उपदेशों का भरसक पालन भी करती थीं।

टीएलए से 'सेवा' तक

पढ़ाई के बाद इला बहन टीएलए (टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन) में शामिल हो गईं। दिलचस्प है कि इसका गठन वर्ष 1917 में महात्मा गांधी जी ने ही किया था जिसे लंबे समय तक देश में श्रमिक संघों का आदर्श माना गया। वे टेक्सटाइल लेबर्स से जुड़े छोटे मामले देखती थीं, खासकर वेतन बढ़ाने और बोनस देने जैसे मसले। इस दौरान उन्होंने गौर किया कि टीएलए में महिलाएं बहुत कम थीं। उन्हें महिला विंग का प्रमुख बना दिया गया, मगर उनका मन मजदूर और उनकी समस्याओं को और गहराई से समझने का था। इसीलिए आगे की पढ़ाई के लिए वे इजरायल चली गईं।  

'सेवा' में ज्यादातर महिलाएं असंगठित मजदूर थीं, जिन्हें इला ने एक सर्वे के जरिये ढूंढ निकाला था। 'सेवा' का उद्देश्य महिलाओं को लघु उद्योग से जोड़ कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था, जिसमें आगे चलकर वे खासी कामयाब हुईं। 'सेवा' अपने सदस्यों को आवास, बचत और ऋण, पेंशन तथा बीमा जैसी सहायक 'सेवा' प्रदान करती है। इसके अलावा बच्चों की देखभाल तथा कानूनी सहायता भी देती है। आज 'सेवा' के 1,916,676 सदस्य हैं।

पति से मिला सहयोग

वर्ष 1956 में उन्होंने रमेश भट्ट से शादी कर ली। उनके माता पिता इस शादी के खिलाफ थे, पर इला ने अपने दिल की सुनी। इस बाबत वे बताती हैं, 'रमेश से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। वे बहुत प्रतिभाशाली हैं। एक तरह से उनके साथ मेरा विकास हुआ है।' उन्होंने महसूस किया कि टेक्सटाइल में काम करने वाले लेबर्स का कोई यूनियन नहींं था, न कोई सुरक्षा और न कोई कानून इनके अधिकारों की रक्षा करता था। तभी उन्हें खयाल आया 'सेवा' (सेल्फ इंप्लॉइड वीमेन्स एसोसिएशन) का संगठन तैयार करने का। टीएलए के प्रेसिडेंट अरविंद बुच के साथ मिल कर उन्होंने इसकी शुरुआत की। 'सेवा' को रजिस्टर्ड करवाने में बहुत अड़चनें आईं, मगर इला ने हार नहींं मानी और अंतत: सफलता प्राप्त की। 



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