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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

करुणा और संघर्ष की अक्षर दुनिया

नादीन की पहचान एक कथाकार के तौर पर है, जिसने स्त्री संवेदना की दुनिया में फिर से करुणा को केंद्र में लाने का धैर्यपूर्ण यत्न न सिर्फ किया, बल्कि इसमें उन्हें खासी सफलता और सराहना भी मिली

बीसवीं सदी को भले महिला लेखन की सदी न कहा जाए, पर इन सौ सालों में महिला संवेदना की दुनिया ने सबसे प्रगतिशील व क्रांतिकारी रूप से अपने को प्रस्तुत किया। खासतौर पर सदी के उत्तरार्ध आते-आते कई ऐसी महिला साहित्यकारों ने अपनी तरफ दुनिया का ध्यान खींचा, जो अपने परिवेश और देशकाल को लेकर सर्वथा नए विचारसूत्र के साथ साहित्य सृजन के क्षेत्र में उतरीं।  ऐसी ही महान आधुनिक महिला साहित्यकारों में एक बड़ा नाम है नादीन गोर्डिमर।

करुणा और सृजन
साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार प्राप्त नादीन की पहचान एक कथाकार के तौर पर है, जिसने स्त्री संवेदना की दुनिया में फिर से करुणा को केंद्र में लाने का धैर्यपूर्ण यत्न न सिर्फ किया, बल्कि इसमें उन्हें खासी सफलता और सराहना भी मिली। बड़ी बात यह भी रही कि ऐसा करते हुए वह अपने देशकाल से लगातार संवादरत रहीं। यही वजह है कि रंगभेद जैसी समस्या के खिलाफ भी उनकी मुखरता बनी रही।  

रंगभेद के खिलाफ संघर्ष
साहित्य आलोचकों की नजर में दक्षिण अफ्रीका में जन्मी, पली-पढ़ी नादीन व्यापक मनुष्य संवेदना के बारीक-शिल्प की कथाकार हैं। रंगभेद और उपनिवेशवाद के विरूद्ध काले बहुसंख्यकों के अधिकार और आजादी के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, वह काबिले तारीफ है। न सिर्फ अपने दौर में, बल्कि उसके बाद भी एक लेखिका के तौर पर इस तरह की रचनात्मक भूमिका निभाने वाली दूसरी महिला साहित्यकारों के लिए वह आज भी एक प्रेरणा हैं। 

भावुकता रहित शैली
नादीन गोर्डिमर ने अपनी कहानियों-उपन्यासों में स्त्री की वासना-छवि की पारंपरिकता को खंडित करते हुए कथावस्तु और कथा-शिल्प की एक भावुकता रहित शैली रची। गौरतलब है कि नादीन यह दूरदर्शिता खुले बाजार का दौर शुरू होने से पहले दिखा रही थीं। खासतौर पर बीसवीं सदी के आखिर आते-आते दुनिया भर में ऐसे साहित्य की बाढ़ आ गई, जिसमें महिला का अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष उसकी देह की सीमा को लांघता नहीं, बल्कि वह उसे भी अपनी युद्धनीति में शरीक करता है। 
यही कारण है कि उनके औपन्यासिक आख्यानों की नायिका घर से लेकर कार्यस्थल तक अपने लिए सम्मानजनक स्पेस की दरकार को खासे तार्किक लेकिन विश्वसनीय तरीके से पेश करती है। उन्हें 1991 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और तब तक उनकी ख्याति दक्षिण अफ्रीकी लेखिका से आगे रंगभेद के खिलाफ दुनिया की सबसे प्रभावशाली लेखकों में से एक के रूप में होने लगी थी। 

विपुल साहित्य
नादीन ने 30 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। उनकी और दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला के बीच करीबी दोस्ती थी। मंडेला ने उनके बारे में कहा भी है कि उनकी कलम रंगभेद के खिलाफ हमारे संघर्ष में हमेशा साहस के साथ शामिल रही। यह इसलिए भी बड़ी बात है, क्योंकि नादीन खुद अश्वेत नहीं थीं।  

विमर्शीय हस्तक्षेप
नदीन गोर्डिमर की एक बड़ी खासियत यह भी रही कि उन्होंने महिला लेखन को नई शैली, विषय वस्तु का नया विस्तार और संवेदना की आधुनिक जमीन तो दी ही, उन्होंने अपने समय के वैचारिक और रचनात्मक विमर्श को भी खासा प्रभावित किया। उन्होंने अपने समय में उठने वाले हर मुद्दे और चुनौतियों पर अपने विचार मुखरता के साथ रखे। मसलन सेंसरशिप के सवाल पर वह कहती हैं- ‘सेंसरशिप उन लोगों के लिए कभी भी खत्म नहीं होती, जिन्होंने इसका अनुभव किया हो। ये कल्पनाशक्ति पर दाग है, जिसका इसे भोगने वाले इंसान पर हमेशा के लिए असर रहता है।’ हम देख सकते हैं कि एक मुद्दे से जुड़े संदर्भों को लेकर वह कितनी गहराई तक उतरती हैं।

लेखन को लेकर विचार 
अपने लेखन को लेकर नादीन का कहना था- ‘लेखन, जीवन का मतलब समझना है। आप सारी उम्र काम करते हैं और शायद तब आप जिंदगी के एक छोटे से हिस्से को समझ पाते हैं।’ अपने सृजन को लेकर साहस और यकीन देखिए इस महान लेखिका का कि वह एक तरफ जिंदगी को गहराई से समझने की चुनौती को इतना बड़ा मानती हैं, वहीं जब वह अपने लिखे साहित्य की बात करती हैं तो गर्व के साथ कहती हैं- ‘मेरी लिखी या कही गई कोई भी सच्ची बात कभी भी उतनी सच्ची नहीं होगी जितनी कि मेरा फिक्शन या कहानियां।’
नादीन के लिए अपने लेखन को लेकर इस तरह के गर्व और संतोष तक पहुंचना आसान नहीं था। उनका सृजन ईश्वरीय उपहार नहीं, बल्कि एक संघर्ष है, जिसे उन्होंने अपने भीतर और बाहर बराबरी से और पूरी शिद्दत से लड़ा है। 
छायावादी दौर की महान कवयित्री महादेवी ने पीड़ा और दुख को जिस तरह अपने लेखन से लेकर पूरे व्यक्तित्व में साध लिया था, उसकी झलक थोड़े और आधुनिक व क्रांतिकारी तरीके से नादीन में मिलती है। इस संदर्भ में नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते हुए दिए गए उनके भाषण को पढ़ना-सुनना चाहिए। इसमें वह कहती हैं- ‘वास्तव में, लेखन एक तरह का दुख है, जो सबसे ज्यादा अकेलेपन और आत्मविश्लेषण की मांग करने वाला पेशा है। मुझे महसूस होता है और मैंने पाया है कि हम लेखकों में उतना प्रोत्साहन और पागलपन नहीं है, जितना उन लोगों में देखने को मिलता है जो सामूहिक कार्यों में लगे हैं।’ 
अपनी लेखकीय आस्था को प्रकट करते हुए नादीन जो शिकायत नए लेखकों से करती हैं, दरअसल वही हमारे समय के साहित्य का सबसे बड़ा संकट है। 
21वीं सदी का साहित्य अचानक लोकप्रियता और बेस्ट सेलर जैसे तमगों से आंका जाने लगा है, जो जाहिर है कि वह लेखकीय निष्ठा और शपथ से कोसों दूर पहुंच गया है। नादीन का साहित्य संसार इस दूरी को पाटने के जोखिम को तो कबूल करता ही है, वह इसमें सफल भी होता है।



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