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बुधवार, 19 जून 2019

स्वच्छ पर्यावरण की विरासत बचाने की चिंता

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का पर्यावरण के हर पक्ष से प्रेम वंशानुगत विरासत ही नहीं, उनकी अपनी प्रकृति का अटूट अंग था, जिसका उन्होंने चिरस्थाई अनुराग की तरह लालन किया

मैं यह लेख इंदिरा गांधी का मूल्यांकन या उनका आकलन करने की चाहत में नहीं लिख रहा। यह कोशिश उस व्यक्तित्व की नई तस्वीर को लोक के समक्ष रखने की है, जिन पर लिखा बहुतों ने पर उसे समझने की कोशिश शायद ही किसी ने की। एक नेत्री जिसे किसी ने उसके जटिल व विरोधाभासी व्यक्तित्व के लिए जाना तो किसी की निगाह में एक बेहद करिश्माई और सम्मोहक व्यक्तित्व के रूप में समाईं। कौन थीं इंदिरा? क्या थे उनके महत्वपूर्ण कार्य? यह लेख एक यात्रा है उनके इन आयामों के खोज की और उन पर प्रकाश डालने की जिसने उनके जीवन व कार्यों के मूल्यांकन करनेवालों का ध्यान कभी आकृष्ट नहीं किया।
इंदिरा गांधी की संस्थागत शैक्षिक यात्रा अत्यधिक सर्पिल-पथ पर चली थी। उन्होंने विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण अवश्य की लेकिन परिस्थितिवश औपचारिक शैक्षिक उपाधि से वंचित रहीं। व्यावहारिक अनुभवों ने उन्हें जीवन के विश्वविद्यालय द्वारा सर्वोच्च सम्मान के साथ प्रतिष्ठित किया।
इंदिरा गांधी असल में कौन थीं? इतिहासकार हमेशा इस प्रश्न के उत्तर की खोज में मानसिक मल्लयुद्ध करते रहे और संभवतः भविष्य में भी करते रहेंगे! प्रभावशाली उपलब्धियों से मुग्ध उनके विश्वव्यापी गुणग्राही थे। भारी संख्या में उनके ऐसे आलोचक भी थे जो उनके गलत निर्णय या त्रुटिपूर्ण कार्यों से आगे देखने में असमर्थ थे। कई उनकी स्वयं की गलतियां थीं, तो कई उन पर थोपी गईं थीं।
यह निर्विवादित सत्य है कि उनके व्यक्तित्व में एक तीक्ष्ण विरोधाभास था। लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी वचनबद्धता समस्त संदेह से परे थी, यह सत्य इस कालखंड के लिखित दस्तावेज से प्रमाणित होती है। उनके उथल-पुथल भरे संपूर्ण राजनीतिक व व्यक्तिगत जीवन में पर्यावरण के प्रति उनके व्यक्तिगत प्रेम ने हमेशा उन्हें प्रेरित एवं उद्दीप्त किया है। उनका पर्यावरण के हर पक्ष से प्रेम वंशानुगत विरासत ही नहीं, उनकी अपनी प्रकृति का अटूट अंग था, जिसका उन्होंने चिरस्थाई अनुराग की तरह लालन किया।
उनके आलोचक यह कह सकते हैं, ‘इंदिरा की पर्यावरण चिंता और उसके प्रति सहानुभूति से क्या फर्क पड़ेगा?’ ऐसी प्रतिक्रियाएं अभद्रता की सूचक हैं। उनके सत्ता काल में पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका सदा जाग्रत अनुराग व्यक्तिगत कह कर अप्रासंगिक करार नहीं दिया जा सकता। उनका यह अनुराग भारतीय नागरिकों के लिए आह्वान बन गया था, जिसने यह परिभाषित कर दिया था कि वह कौन हैं और मुल्क के प्रधानमंत्री के रूप में वह कौन- सी दिशा तय कर रहीं थीं। अत: उनके कार्यों के मूल्यांकन करते वक्त पर्यावरण संरक्षण के प्रखर समर्थक के रूप उन्होंने क्या हासिल किया, इसका आकलन अत्यावश्यक है।
एक राष्ट्राध्यक्ष के रूप में अपने संपूर्ण कार्यकाल में वह लगातार संकटों से जूझती रहीं और हर परिस्थिति में पर्यावरण संरक्षण के प्रति वचनबद्ध अनुराग के माध्यम से इंदिरा गांधी ने अपना यथार्थ रूप पेश किया। आजाद हिंदुस्तान के इतिहास के सर्वाधिक मुश्किल काल खंड में राष्ट्राध्यक्ष के रूप में सरकारी कामकाज के बावजूद पर्यावरण संबंधी मसलों पर पूरा ध्यान देते रहना उन्हें और आकर्षक व मोहक बनाता है। जैसे-जैसे राजनीतिक दबाव उन पर बढ़ते रहे, इंदिरा प्रकृति के और नजदीक जाती रहीं। शायद वह राजनीति को अपने जीवन में क्षणिक और प्रकृति को अटल, महत्वपूर्ण व नित्य मानती रहीं। यह सुप्रसिद्ध है कि वह अक्सर अपने मिलने वालों के साथ अथवा बैठकों में उदासीन व अनमनी दिखती थीं, अपनी फाइलें पढ़तीं या अपने प्रिय शगल तस्वीर बनाने में लिप्त रहती थीं। पर पर्यावरणविदों से मिलते वक्त अथवा वन्यजीवों, जंगलों या पर्यावरण संरक्षण की बैठकों में निस्संदेह ऐसा नहीं था। ऐसे मौकों पर वह पूरे मनोयोग, एकाग्रचित्त, संलिप्त तथा स्थिति का प्रभार लिए रहती थीं।
वर्तमान परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन एवं दीर्घकालिक विकास के मुद्दों पर आज के अधिकतर राष्ट्राध्यक्ष अथवा सरकारें अपने चिकनी चुपड़ी भाषण पटुता में व्यस्त दिखते हैं, परंतु आज से चार दशक पहले इंदिरा गांधी उन चुनिंदा राजनीतिक व्यक्तित्वों में थीं जिन्होंने पर्यावरण विषयक मसलों को गंभीरता से लिया और दैनंदिन शासन प्रणाली में स्थान दिया। स्मरणार्थ याद दिलाना उचित होगा कि जून 1972 को स्टॉकहोम में आयोजित प्रथम संयुक्त राष्ट्र के मानवीय पर्यावरण सम्मेलन में आयोजक राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष के अलावा वह एकमात्र राष्ट्राध्यक्ष थीं, जिन्होंने अपनी बात रखी थी। 
इसी प्रकार, वह उन पांच राष्ट्राध्यक्षों में थीं, जिन्होंने अगस्त 1976 में नैरोबी में आयोजित प्रथम नवीन एवं अक्षय ऊर्जा स्रोतों पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन को संबोधित किया था। 1992 में विख्यात रियो अर्थ समिट कॉन्फ्रेंस से इसकी तुलना कीजिए, जहां सौ से अधिक राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे।
इंदिरा गांधी पर्यावरण संबंधित मसलों पर मात्र भारत में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भी अग्रणी रहीं। अक्सर इंदिरा गांधी को एक सख्त नेतृत्व के रूप में पेश किया जाता है। प्रकृति में उनके जीवन ने अक्सर यह साबित किया था कि हर अधिकार रहने पर भी उनका कहा नहीं हुआ। असंदिग्ध रूप से ऐसा कई बार हुआ कि उन्होंने किसी विशेष कार्य को करने के लिए दृढ़तापूर्वक कहा हो। लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उनका जीवन सुझावों और अनुनयों की एक लंबी यात्रा थी। यह पद्धति दो तथ्यों से निर्देशित थी। प्रथमत: भारतीय परिदृश्य में जीवनयापन के स्तर को सुधारना व आर्थिक विकास के माध्यम से जीवन शैली की गुणवत्ता को बेहतर बनाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है। दूसरा पर्यावरण का संरक्षण व वातावरण की सुरक्षा संबंधित अधिकांश निर्णय जो वह लेना चाहती थीं, राज्य सरकारों की मूल जिम्मेदारी है। अगर उनमें तथाकथित सख्ती का रवैया मौजूद होता तो एक पर्यावरणविद के रूप में उन्होंने जो कुछ हासिल किया, उससे कहीं अधिक कर चुकी होतीं।
उसी प्रकार, इंदिरा गांधी का जीवन हमें उनके द्वारा लिए गए निर्णयों के कारण हुए उनके मानसिक संताप की याद भी दिलाता है। उदाहरणार्थ, साइलेंट वैली को हाइडेल प्रोजेक्ट से बचाना आवश्यक था, यह उन्हें मालूम था पर इस मुद्दे पर तीन साल चली चर्चा के उपरांत ही उन्होंने अंतिम निर्णय लिया था। कई मौकों पर अपने पर्यावरणीय दृढ़ निश्चय के विरुद्ध कोई विशेष निर्णय, वृहत्तर आर्थिक व राजनीतिक लाभ के निमित्त लेने के लिए खुद को मनाया भी। कभी ऐसा भी हुआ कि निर्णय लेने से पूर्व उन्होंने अपने विश्वस्त व विख्यात पर्यावरणविद सलीम अली, पीटर स्कॉट और पीटर जैक्सन जैसे व्यक्तियों से राय-मशविरा किया हो। उनका नजरिया हर नई परिस्थिति से सामना होते हुए विकसित हुआ। वक्त के साथ उन्हें यह विश्वास होने लगा कि स्थानीय समुदायों की सहभागिता के बिना न वन्यजीवों का और न ही जंगलों का दीर्घकालिक संरक्षण संभव है, जबकि शुरुआती दौर में उनकी सोच शुद्धतावादी थी।
इसमें संदेह नहीं कि उनका व्यक्तित्व तिलिस्मों से घिरा था, पर मौलिक इंदिरा गांधी संपूर्ण प्रतिबद्धता के साथ एक संरक्षण-कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने समृद्ध प्राकृतिक विरासत को मुल्क की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परंपरा के संरक्षण और  आर्थिक गतिशीलता के मूल आधार के रूप में देखा। वास्तविकता यही थी कि उनके लिए संरक्षण के अभाव में विकास अल्पकालिक व क्षणभंगुर था, अविकसित संरक्षण अग्राह्य था। उनके लिए संरक्षण, जैविक विविधता के प्रति सम्मान एवं पर्यावरणीय संतुलन का प्रयोजन इत्यादि हमारे सांस्कृतिक चरित्र से ही उत्पन्न हुआ है। वह प्राय: हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों की मूल शिक्षा ‘प्रकृति के प्रति आदरभाव व उसके सामंजस्य में जिओ’ का संदर्भ देती रहीं। उनकी पर्यावरणीय विरासत किसी विशेषज्ञ अथवा चेतावनी के रूप में नहीं दिखती। यह विरासत हमेशा के लिए एक निरंतर गुंजन है। 
(जयराम रमेश की 2017 में प्रकाशित पुस्तक ‘इंदिरा गांधी : ए लाइफ इन नेचर’ का संपादित अंश )



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