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गुरुवार, 27 जून 2019

हृदय रोगियों के लिए फायदेमंद है योग

योगा-केयर हृदय रोगियों के रिहैब्लेटेशन का एक सुरक्षित और कम खर्चीला विकल्प हो सकता है। इसमें प्रशिक्षक को छोड़कर अन्य किसी तरह की जरूरत भी पड़ती नहीं है

योग हृदय रोगियों को दोबारा सामान्य जीवन जीने में मदद कर सकता है। लंबे समय तक किए गए क्लीनिकल ट्रायल के बाद भारतीय शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं।
इस ट्रायल के दौरान हृदय रोग से ग्रस्त मरीज में योग आधारित पुनर्वास (योगा-केयर) की तुलना देखभाल की उन्नत मानक प्रक्रियाओं से की गई है। हृदय रोगों से ग्रस्त मरीज में योगा-केयर के प्रभाव का आकलन करने के लिए देशभर के 24 स्थान पर यह अध्ययन किया गया है। लगातार 48 सत्र तक चले इस अध्ययन में अस्पताल में दाखिल या डिस्चार्ज हो चुके चार हजार हृदय रोगियों को शामिल किया गया।
ट्रायल के दौरान तीन महीने तक अस्पताल और मरीज के घर पर योग-केयर से जुड़े प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए थे। दस या उससे अधिक योगा-केयर प्रशिक्षण सत्रों में उपस्थित रहने वाले मरीज के स्वास्थ्य में अन्य मरीज की अपेक्षा अधिक सुधार देखा गया। अध्ययन के दौरान मरीज के अस्पताल में दाखिल होने की दर और मृत्यु दर में कमी इसके प्रभावों के रूप में देखा गया है।
पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डोरिजराज पराकरन के अनुसार, ‘योगा-केयर हृदय रोगियों के रिहैब्लेटेशन का एक सुरक्षित और कम खर्चीला विकल्प हो सकता है। इसमें प्रशिक्षक को छोड़कर अन्य किसी तरह की जरूरत भी नहीं पड़ती है।’
योगा-केयर योग आधारित थेरेपी है। यह हृदय रोग विशेषज्ञों और अनुभवी योग प्रशिक्षक की मदद से हृदय रोगियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। इसमें ध्यान, श्वास अभ्यास, हृदय अनुकूल चुनिंदा योगासन और जीवन शैली से संबंधित सलाह शामिल हैं। इस अध्ययन में सामान्य जीवनशैली अपनाए जाने की सलाह दी गई। 
यह अध्ययन पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। 
इससे संबंधित शोध पत्र शिकागो में आयोजित अमेरिकी हार्ट एसोसिएशन के साइंटिफिक सेशन में पेश किया गया। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि सहायक योगा-केयर की मदद से रोगी फिर से वह सब कुछ कर सकते हैं, जो हार्टअटैक से पूर्व करने में वे सक्षम थे। यह अध्ययन भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा किए गए अनुदान पर आधारित है।
भारत में हृदय रोगियों की संख्या वर्ष 1990 में एक करोड़ थी। वर्ष 2016 के आंकड़े के मुताबिक यह संख्या बढ़कर 2.4 करोड़ हो गई। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन से जुड़े इस अध्ययन के एक अन्य शोधकर्ता प्रोफेसर प्रोफेसर किनरा के मुताबिक, ‘हृदय संबंधी रोगों से संबंधित चिकित्सा देखभाल में सुधार के कारण हार्टअटैक के मरीज़ को समय पर इलाज मिल जाए तो उसकी जान बच सकती है।’  (इंडिया साइंस वायर)



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