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मंगलवार, 25 जून 2019

प्रोमिला विस्वास - आपका दिल सच्चा हो, फिर भगवान आपके साथ होंगे

प्रोमिला को तब नहीं पता था कि वह घर क्यों छोड़ रही हैं, शायद उन्हें भगवान को महसूस करना था और फिर यही हुआ

‘प्यारे दरसन दीज्यो आय तुम बिन रह्यो न जाय, जल बिन कमल चंद बिन रजनी ऐसे तुम देख्यां बिन सजनी, आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन बिरह कालजो खाय, दिवस न भूख नींद नहिं रैना मुख सूं कथत न आवे बैना।’ 

ओडिशा की रहने वाली, प्रोमिला विस्वास कान्हा की नगरी वृंदावन की सड़कों पर घूमती हैं और अगरबत्ती बनाने से उन्हें खास लगाव है।
वह बेहद उत्साह के साथ बताती हैं, “मेरी आंखें थोड़ी कमजोर हो गई हैं, इसीलिए अब ज्यादा सिलाई नहीं कर पाती हूं, लेकिन अगरबत्ती बनाना मुझे बहुत पसंद है। इसके आलावा, मैं भगवद गीता पढ़ती हूं, माला जपती हूं, प्रभु का भजन करती हूं...।”
लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। उनकी इस खुशहाल कहानी का एक स्याह पक्ष भी है। प्रोमिला जब 12 साल की थीं तभी उनकी शादी, एक 18 साल के व्यक्ति से हो गई थी। बेहद कम उम्र में शादी के बंधन में बंधने के बाद भी, दोनों ने बेहतर जीवन की उम्मीद में, अपनी जिंदगी की नई शुरुआत की। उनके एक लड़का और लड़की पैदा हुई। प्रोमिला का पति आजीविका चलाने के लिए खेतों में काम करता था, और वह अपने दोनों बच्चों की घर पर देखभाल करती थी। वह चारों, अपनी जिंदगी में बहुत खुश थे।
वक्त गुजरा, बच्चे बड़े हुए। प्रोमिला और उसके पति ने अपनी क्षमता के अनुसार दोनों बच्चों की खूब धूम-धाम से शादी की। लेकिन एक रात वह हुआ, जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी। प्रोमिला के पति को एक जहरीले सांप ने काट लिया। इससे पहले कि वह कुछ कर पाती, जहर उसके पति के पूरे शरीर में फैल गया। और प्रोमिला का पति, उसे हमेशा के लिए छोड़कर चला गया।
यह सब इतनी जल्दी हुआ कि प्रोमिला को कुछ समझ ही नहीं आया। जब सबकुछ ठीक चल रहा था, दोनों खुश थे, दोनों ने अपने सारे कर्तव्यों का निर्वाहन कर लिया था, तभी भगवान ने उनकी जिंदगी में सब कुछ हमेशा के लिए बदल दिया।
प्रोमिला, अब वैधव्य की चादर में लिपटी एक नीरस और रंगहीन जिंदगी जीने लगी थी। उसने मान लिया था कि शायद यही उसका नसीब है। वह अभी अपने पति के दर्द से उबरने की कोशिश कर ही रही थी, कि अचानक एक और भयावह खबर उसके दरवाजे पर दस्तक देने वाली थी। 
अब काल ने उसकी बेटी की तरफ नजर फेर ली थी। शादी के बाद उसकी बेटी ने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन बच्ची के जन्म के कुछ ही दिन बाद, उसकी बेटी की मौत हो गई। बेटी की मौत ने जैसे प्रोमिला को अंदर तक हिला दिया था। 
लेकिन प्रोमिला ने खुद को संभालते हुए, अपनी बेटी की बच्ची में ही अपनी खुशी तलाशनी शुरू कर दी। उसे लगा कि उसकी बेटी तो गुजर गई है, लेकिन उसके बच्चे के रूप में उसे अपनी बेटी दोबारा मिली है। इसीलिए प्रोमिला ने उसको पालना शुरू कर दिया, पूरे मन से उसकी देखभाल करने लगी।
उसने अपने वैधव्य के जीवन को भूलकर एक मां के जीवन को फिर से अपना लिया और उस बच्ची के लिए मां बनकर उसका लालन-पोषण करने लगी। बच्ची को भी अपनी नानी से बहुत लगाव हो चुका था। 
पांच साल कैसे गुजर गए, पता ही नहीं चला। बच्ची अब थोड़ी बड़ी हो चुकी थी। इसीलिए प्रोमिला के लिए, अब कठिन फैसला करने का वक्त आ गया था। प्रोमिला ने बच्ची की जिम्मेदारी, उसके पिता यानी अपने दामाद को सौंपकर, फिर से वैधव्य भरे जीवन में लौटने का फैसला कर लिया। 
प्रोमिला ने वृंदावन के बारे में पहले कहीं सुना था, इसीलिए वह जानती थी कि यहां उनके जैसी वैधव्य भरा जीवन जीने वाली विधवाएं रहती हैं। सो, अब प्रोमिला ने भी वृंदावन जाने की तैयारी कर ली। अब प्रोमिला को वृंदावन की पवित्र धरती में जीवन गुजारते हुए लगभग 7 साल हो गए हैं। 
‘शुरुआत में, मैं हर दो महीने पर निरंतर वृंदावन आती थी। मैं मीराबाई आश्रम में भजन गाती और गुरुकुल में ठहरती थी। लगभग 7 साल पहले, मैंने यहीं रुकने का फैसला किया। फिर मैं मां शारदा महिला आश्रम में रहने लगी। हां, मेरी पोती मुझे बहुत याद करती है। जब भी मैं उससे मिलने जाती हूं, वह यही कहती है कि यहीं रुक जाओ। वह कहती है कि आप जिंदा हो, फिर भी मुझे यही लगता है कि मेरी नानी अब मेरे साथ नहीं हैं। लेकिन मैंने वही किया जो मैं चाहती थी। मुझे अपने वैधव्य भरे नीरस जीवन के लिए एक उद्देश्य चाहिए था जो मुझे वृंदावन आकर मिला।’
प्रोमिला हर चीज के चमकीले और सकारात्मक पक्ष को देखती हैं। शायद इसी वजह से जब उनसे दैनिक जीवन के बारे में पूछा, तो उन्होंने बहुत उत्साह से जवाब दिया। भजन, गीता का सुमिरन, खाना बनाना और खुद भगवान की भक्ति में तल्लीन रखना, यही सब उनकी खुशी का कारण है। और हां, अगरबत्ती बनाना भी उन्हें बहुत भाता है - उसकी खुशबू उन्हें शांति और संतुष्टि देती है।
प्रोमिला अब सुलभ द्वारा सहायता प्राप्त आश्रम में रहती हैं और अपनी जिंदगी से संतुष्ट हैं। वह बताती है कि लाल बाबा (डॉ. विन्देश्वर पाठक) की शरण में आकर, उन्हें जीवन जीने के लिए मूलभूत सुविधाओं की कभी कमी नहीं रही। उनके लिए अब हर प्रकार की सहायता उपलब्ध रहती है।
प्रोमिला अपने झुर्रियों भरे चेहरे पर आत्म-संतुष्टि की लालिमा के साथ, एक खूबसूरत मुस्कान बिखेरते हुए कहती हैं, ‘मैंने भगवान को कभी नहीं देखा है, लेकिन मैं उसकी उपस्थिति वृंदावन की माटी में महसूस कर सकती हूं। मैं उसे हर किसी में और हर जगह महसूस कर सकती हैं। क्या भगवान हर किसी में नहीं है? मुझमें, तुममे, हर किसी में! बस आपको साफ दिल और भक्ति भाव के साथ करीब से देखना है। यही मुझे वृंदावन ने सिखाया है। जब मैंने घर छोड़ा, मैं नहीं जानती थी कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं। शायद, मैं भगवान की सच्ची उपस्थिति को समझने और महसूस करने वाली थी।’ 



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